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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

by भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी)

DevanagariHindipublished723 pages

प्रारंभिक पृष्ठ एवं विस्तृत गोल-मीमांसा भूमिका

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श्रीमद्भास्कराचार्यविरचित
सिद्धान्तशिरोमणेः
गोलाध्यायः
व्याख्याकार श्री पं० केदारदत्त जोशी
[चित्र विवरण:]
रवि कक्षा
र
दृ
च पृष्ठीय क्षितिज
ह
ज
गर्भीयक्षितिज प
ल थ भू
म
भूबिम्ब
य

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Indological Truths

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॥ श्रीः ॥
श्रीमद्भास्कराचार्य विरचिते
सिद्धान्तशिरोमणौ
गोलाध्यायः
स्वोपज्ञवासनाभाष्येण, मुनीश्वरापरनामविश्वरूपविरचित—
मरीचिभाष्येण च समलङ्कृतः
जोश्युपाख्य केदारदत्तविरचितया हिन्दीव्याख्यया उपपत्त्या च सहितः
व्याख्याकार :—
श्री पं० केदारदत्त जोशी
ज्योतिषशास्त्राचार्य ( गणित + फलित )
अवकाशप्राप्त प्राध्यापक ज्योतिष विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
१/२८ हरिहर्ष निकेतन
नगवा ( नलगाँव ), वाराणसी २२१००५
मो ती ला ल ब ना र सी दा स
दिल्ली वाराणसी पटना
मद्रास बंगलौर

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प्रथम संस्करण : १९८८
© मो ती ला ल ब ना र सी दा स
मुख्य कार्यालय : बंगलो रोड, जवाहरनगर, दिल्ली ११० ००७
शाखाएँ : चौक, वाराणसी २२१ ००१
अशोक राजपथ, पटना ८०० ००४
२४ रेसकोर्स रोड, माधव नगर, बंगलौर-५६०००१
१२० रायपेट्टा हाई रोड, मैलापुर, मद्रास ६०० ००४
नरेन्द्रप्रकाश जैन, मोतीलाल बनारसीदास, चौक, वाराणसी
द्वारा प्रकाशित एवं वर्द्धमान मुद्रणालय, जवाहरनगर, वाराणसी द्वारा मुद्रित ।

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प्राक्कथन
प्रस्तुत पुस्तक में भारत के प्राचीन ज्योतिर्विदों में अति महत्त्व का स्थान
रखने वाले श्री भास्कराचार्य के प्रसिद्ध 'सिद्धांत शिरोमणि' के गोलाध्याय
ग्रन्थ का सटीक विवेचन है। आजकल के पाठकों के लिये इस पुस्तक का विशेष
रूप से लाभ लेखक की 'केदारदत्त' हिन्दी टीका एवं उपपत्ति के कारण है।
संस्कृत जानने वाले तो मूल ग्रन्थ, उसका 'वासना भाष्य' एवं 'मरीचि' संस्कृत
टीका का भी आनन्द ले सकते हैं।
भास्कराचार्य को मैं पूर्व परम्परा के वैज्ञानिकों की मालिका का अन्तिम
मणि मानता हूँ। उनका रचनाकाल था बारहवीं-तेरहवीं सदी में (११४४-१२२३
ईसवी सन्) । पहला ग्रन्थ 'सिद्धान्त शिरोमणि' उन्होंने लिखा ३६ वें वर्ष की
आयु में और दूसरा ग्रन्थ 'करण कुतूहल' ६९ वर्ष की अवस्था में ! लीलावती,
बीजगणित, ग्रहगणित एवं गोलाध्याय ये पहले ग्रन्थ के चार खण्ड हैं जो भारत
में गणित की पाठ्यपुस्तकों के रूप में पाँच सौ वर्ष अध्ययन के विषय बने रहे।
फारसी में अनूदित हुए एवं उनकी कीर्ति योरप तक पहुँची।
प्रस्तुत खण्ड से हमें भास्कराचार्य की बौद्धिक प्रगल्भता एवं तत्कालीन
पार्श्व भूमि पर उनकी विषय की जानकारी के दर्शन मिलते हैं। प्रारम्भ में ही
उपपत्ति ज्ञान की महत्ता वे स्पष्ट करते हैं (गोल प्रशंसाध्याय, श्लोक २-४)
जिससे आधुनिक वैज्ञानिक या गणितज्ञ पूर्ण सहमत रहेगा। तत्कालीन विचार-
धारानुसार भास्कराचार्य भी भूकेन्द्रित सिद्धान्त में विश्वास रखते थे (भुवन-
कोश, श्लोक ३) लेकिन पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की कल्पना में (भुवनकोश,
श्लोक ६) वे अपने समय से आगे थे। भुवनकोश के १३-१४ वें श्लोक में
उन्होंने गोल पृथ्वी की परिधि का छोटा सा भाग समतल लगता है इस महत्त्व
के नियम का प्रतिपादन किया था। उसी अध्याय के ५२ वें श्लोक में आचार्य
ने पृथ्वी का व्यास १५८१ १/२४ योजन लिखा है। पाँच मील के योजन से यह मान
ठीक उतरता है।
फिर आगे चलकर मध्यगति वासना के पहले तीन श्लोकों से पृथ्वी के चारों
ओर फैले वायुमण्डल की विभिन्न सतहों की चर्चा है जो आधुनिक अंतरिक्षज्ञान
से तुलना में सही न होने पर भी कल्पना स्वरूप विचारणीय है। ग्रहों का पीछे
जाना, सूर्योदय एवं सूर्यास्त के स्थानानुसार बदलने वाले समय, संपात बिंदुओं
का सरकना, चंद्रमा पर से पृथ्वी के रूप की कल्पना एवं ग्रहणों का वैज्ञानिक

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विश्लेषण इन सभी बातों से भास्कराचार्य द्वारा प्राप्त खगोल विज्ञान की परि-
पक्वता का हम अनुमान कर सकते हैं ।
इस खंड में ऐसे भी स्थान हैं जहाँ आचार्य ने परंपरागत विचारों से टक्कर
लेने के बजाय उनसे समन्वय साधा है । ग्रहण वासना के श्लोक ७-१० में ग्रहणों
की वैज्ञानिक मीमांसा करके भी आखिर राहु के अस्तित्व को भी मान लिया
है । उसी प्रकार ज्योतिःशास्त्र का प्रयोजन फलित ज्योतिष के लिये है इस पूर्व
परंपरागत विचारधारा को भी उन्होंने दोहराया है । आधुनिक विज्ञान की दृष्टि
से आज ये विचार गलत हैं पर हमें आज उनको तत्कालीन विचार परंपरा के
कुशाग्रबुद्धि वैज्ञानिक पर पड़े दबाव के रूप में देखना है ।
इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ को प्रकाशित कर उसके विचारों की सोपपत्तिक चर्चा
पाठकों के सामने प्रस्तुत कर पं० केदारदत्त जी ने जो महत्व का कार्य किया है
उसके लिये मैं उन्हें बधाई देता हूँ । आशा है कि हमारी उज्ज्वल परंपरा के
सबूत इस ग्रन्थ का रसिक बुद्धिजीवी पाठक स्वागत करेंगे ।
खगोल भौतिकी विभाग, जयंत विष्णु नार्लीकर
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, बम्बई अक्टूबर, १९८७

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विषयानुक्रमणिका
अध्यायाः पृष्ठाङ्काः
१–गोलप्रशंसाध्यायः १–१२
२–गोलस्वरूपप्रश्नाध्यायः १३–२३
३–भुवनकोशाध्यायः २४–११०
४–मध्यगतिवासनाध्यायः १११–१५१
५–छेद्यकाधिकारः १५२–१९७
६–ज्योत्पत्तिवासनाध्यायः १९८–२२६
७–गोलबन्धाधिकारः २२७–२७१
८–त्रिप्रश्नवासनाध्यायः २७२–३२४
९–ग्रहणवासनाध्यायः ३२५–३८१
१०–उदयास्तवासनाध्यायः ३८२–४०१
११–शृङ्गोन्नतिवासनाध्यायः ४०२–४१३
१२–यन्त्राध्यायः ४१४–४९४
१३–ऋतुवर्णनाध्यायः ४९५–५२३
१४–प्रश्नाध्यायः ५२४–६००
श्लोकानुक्रमणिका ६०१–६१९

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॥ श्रीः ॥
सिद्धान्तशिरोमणि ग्रहगोलाध्याय
खगोल गणित का एक अध्ययन
यज्ञानुष्ठान की सफलतापूर्वक परिसमाप्ति हेतु ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान अपेक्षित है ।
उसका समारम्भ और समाप्ति अनुकूल ग्रहज्ञान की आधारभूमि पर अधिष्ठित है ।
अणुवादी विचारधारा, ग्रहण का अध्ययन, पृथ्वी की परिभ्रमण गति और दशमलव
पद्धति के विचार का उत्स यही है । आर्च ज्योतिष के अनुसार :—
वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्वा विहिताश्च यज्ञाः ।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञम् ॥
अर्थात् वेदों का प्रधान विषय यज्ञ संपादन है और यज्ञ के आरम्भ से उसकी समाप्ति
तक सफलता की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि ग्रहों की गति को लक्ष्यकर तथा उसे
आधार बनाकर उनका आरम्भ किया जाता है, जिसकी सम्पूर्ण सूचना ज्योतिष शास्त्र के
माध्यम से मिलती है । परम्परया, ज्योतिषशास्त्र के प्राचीनतम सिद्धांतों की प्राप्ति हमें
शुल्व सूत्रों से होती है। "शुल्व" शब्द 'नापने का डोरा' का द्योतक है, जिसके माध्यम से
ज्यामिति, रेखागणित और ज्योतिष के सूत्रों का निदर्शन होता है ।
शिक्षा, व्याकरण, ज्योतिष इत्यादि, ये सभी शास्त्र 'वेद' के अंग होने से उक्त शास्त्र
'वेद' मूलक है । अतः ज्योतिषशास्त्र के तीनों स्कन्ध वेदमूलक होने से परिष्कार रूप में
वेदों के आशय को स्पष्ट करने के लिए वेद के षडंग शास्त्रों में ज्योतिष 'वेद' विद्या का
चक्षुस्थानीय कहा गया है जिसकी मुख्यता भी कही गई है कि 'सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधा-
नम्' । पुरुष का नेत्र ही मुख्य अंग है । 'वेद' के मुख्य अंग ज्योतिष स्कन्ध में भास्करा-
चार्य विरचित 'सिद्धांतशिरोमणि' ग्रन्थ का स्थान सर्वोपरि माना गया है ।
श्री भास्कराचार्य विरचित 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ का महत्व ११ वीं शताब्दी से
आज तक अबाधगति से चला आ रहा है । ऐसे महान ग्रहगोलज्ञ का संक्षिप्त परिचय देना
आवश्यक है । 'आर्यभट्ट' और उनकी परम्परा के 'लल्लाचार्य', 'वराहमिहिर', 'मुञ्जाल',
द्वितीय 'आर्यभट्ट' तथा 'ब्रह्मगुप्त' के पश्चात् सह्यपर्वत के निकट विज्जड़विड (ऐति-
हासिकों के मतानुसार आधुनिक बीजापुर) नामक स्थान में शांडिल्य गोत्रीय श्रीमान
महेश्वर उपाध्याय के घर में १०३६ शक संवत में भारतवर्ष के 'भूषण' के रूप में
साक्षात् भास्करावतार आचार्य 'भास्कर' उत्पन्न हुये थे । विष्णु पुराण ग्रन्थ के पद्यों के

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अधिक प्रमाणभूत दृष्टांतोंसे, तथा मिताक्षरा के—‘‘यस्मात् क्षुब्ध प्रकृतिपुरुषाभ्याम्’’
श्लोक की मिताक्षरा में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युन और अनिरुद्ध नामक मूर्ति भेदों का
वैष्णव आगमों में विशेष समादर होने से, ये ‘‘कर्णाटक’’ वैष्णव ब्राह्मण थे, ऐसा
अनुमान लगाया जाता है। श्री भास्कराचार्य ने ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ के ‘बीजगणित’
भाग के उपसंहार में लिखा है कि उनके गुरु उनके पिता ‘‘श्री पं० महेश्वर उपाध्याय’’
ही थे। क्योंकि ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ की प्राचीन प्रतिलिपियों में अध्याय समाप्ति पर
‘‘महेश्वरोपाध्यायसुत भास्कराचार्य विरचिते’’ लेख मिलता है।
श्री भास्कराचार्य विरचित ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ के चार विभाग हैं—१—लीलावती
(अंकगणित), २—बीजगणित, ३—ग्रहगणिताध्याय एवं ४—ग्रहगोलाध्याय। वस्तुतः
‘सिद्धांतशिरोमणि’ के प्रसिद्ध चार विभागों में ग्रहगोलगणित का महत्व शीर्षस्थ है, जो
आज भी निर्विवाद और निर्भ्रान्त रूप में सर्वविदित और सर्वमान्य है।
श्री भास्कराचार्य विरचित ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ के चार विभाग है जिनका
उल्लेख ऊपर किया गया है, यहां उनके सामान्य परिचय के साथ ‘ग्रहगोलाध्याय’ का
सांगोपांग विवेचन करना मेरा अभीष्ट है। इस विवेचन से पूर्व के अन्य विभागों पर
दृष्टिपात करना आवश्यक होगा—

सिद्धान्तशिरोमणि एवं लीलावती (अंकगणित)

भास्कराचार्य विरचित ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ का प्रथम भाग ‘लीलावती’ है।
‘लीलावती’ में हमें पाटी-गणित अर्थात् अंकगणित के क्षेत्र में भास्कराचार्य के वैदुष्य का
अद्भुत प्रदर्शन देखने को मिलता है। गणित जैसे कठिन विषय को भास्कराचार्य ने
‘लीलावती’ के माध्यम से सुन्दर सरल काव्य का रूप देकर बुद्धिमान गणितज्ञों के लिए
सुसरल काव्य की भाषा के रूप में प्रस्तुत किया है। इसीलिए उन्होंने ग्रंथारम्भ के
मंगलाचरण में श्री गणेश जी की स्तुति करते हुये कहा है कि—
प्रीतिं भक्तजनस्य यो जनयते विघ्नं विनिघ्नन् स्मृत-
स्तं वृन्दारकवृन्दवन्दितपदं नत्वा मतङ्गाननम् ।
पाटीं सद्गणितस्य वच्मि चतुरप्रीतिप्रदां स्फुटां
संक्षिप्ताक्षरकोमलामलपदैर्लालित्यलीलावतीम् ॥
‘लीलावती’ के प्रारम्भ में आचार्य ने तत्कालीन ई० सन् १११४ के समीप के
वाराटक, काकिणी, पण, द्रुम, निष्क, गुञ्जा, माषा, कर्ष, पल, अङ्गुल, हस्त, दण्ड,
क्रोश, योजन, निर्वर्तन (वीघा), खारिका, द्रोण, आढक, प्रस्थ और कुडव आदि सुवर्ण,
रजत, तौल, भूमिनाप आदि के पारिभाषिक शब्दों का उल्लेख करते हुये दशगुणोत्तर
अंको की नामावली का भी वर्णन सुन्दर तरीके से किया है—

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( ३ )
एकदशशतसहस्रायुतलक्षप्रयुतकोटयः क्रमशः ।
अर्बुदमब्जं खर्वनिखर्वमहापद्मशङ्कवस्तस्मात् ॥
जलधिश्चान्त्यं मध्यं परार्धमिति दशगुणोत्तराः संज्ञाः ।
संख्यायाः स्थानानां व्यवहारार्थं कृताः पूर्वैः ॥
अर्थात्—
एक = १
दश = १०
शत = १००
सहस्र = १०००
अयुत = १००००
लक्ष = १०००००
प्रयुत = १००००००
कोटि = १०००००००
अर्बुद = १००००००००
अब्ज = १०००००००००
खर्व = १००००००००००
निखर्व = १०००००००००००
महापद्म = १००००००००००००
शंकु = १०००००००००००००
जलधि = १००००००००००००००
अन्त्य = १०००००००००००००००
मध्य = १००००००००००००००००
परार्ध = १०००००००००००००००००
उपरोक्त प्रकार से और आगे "अनंत" (न अन्त = अनन्त = ब्रह्म) अंक का
स्थानीय मान बताया है । “अंकानां वामतोगतिः” यह सिद्धांत सम्पूर्ण ज्योतिष शास्त्र
के व्यवहार में आता है । इसमें भी एक रहस्य यह है कि १ (एक) अंक के आगे एक ०
(शून्य) देने में, १ (एक) को बाँये ही लिखने से १ (एक) का दशगुना और दो शून्यों
के बाँये एक लिखने से १०० हो जाता हैं। इसी प्रकार प्रत्येक दश स्थानीय एक या
कोई भी अंक वाम होने से उत्तरोत्तर दशगुणित अंक मान वृद्धि से अनंतत्व का बोध होता
है । पुरुष स्थानीय अंक से वामगतिक स्त्री स्थानीय अंक के विन्यास से दशगुणित वृद्धि
होती रहती है, यही सृष्टि क्रम है। अतएव स्त्री माया, आद्या, शक्तिमयी, वामगामिनी,

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,
इष्टकल्पना = १०० का वर्ग = १०००० को ८ से और भाज्य से गुणा करने पर
१६९ × १०००० × ८ = १३५२०००० । इसके मूल = ३६७७ में इष्ट संख्या = १००
गुणित हर = ८ = ८०० का भाग दे देने से ३६७७ ÷ ८०० = ४ ४७७/८०० यही आसन्न मूल
होता है ।
यदि इष्ट अङ्क की कल्पना = १०००, १०००० इत्यादि जैसे-जैसे अधिक से अधिक
इष्ट संख्या कल्पना करेंगे तो आसन्नमूल ४ ४७७/८०० से भी और अधिक सूक्ष्म में आवेगा ।
उपपत्ति से भी = यदि राशि = य/ल अतः य/ल = (य × ल × महान् इ. अङ्क²) / (य × ल × महान् इष्ट²)
(य × ल × म. इ.²) / (ल² × म. इ.²) = √(य × ल × म. इ.²) / (ल × म. इ.) = √(य/ल) = सूक्ष्ममूल
= ३६७७/८०० = ४.५९६२५८ दशमलव प्रणाली से भी हो जाता है ।
अतः सावयव अङ्कों का सूक्ष्ममूल गणित ज्ञान के

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( ५ )
भास्कराचार्य की अंकगणित की कुछ प्रतिभाएँ
भास्कराचार्य ने लीलावती ग्रन्थ के क्षेत्र व्यवहार में चतुर्भुज क्षेत्र के क्षेत्रफल निका-
लने के सम्बन्ध में अपनी सूक्ष्म बुद्धि का परिचय दिया है । एक चतुर्भुज क्षेत्र है ।
जिसकी दोनों भुजाएँ क्रमशः ५२ और ३९ हैं । जिसकी भूमि आधार ६० के तुल्य है,
तथा जिसका मुख २५ हाथ के तुल्य है । प्राचीनों ने इस क्षेत्र को अतुल्य लम्बक कहते
हुये इसके दोनों कर्णों को क्रमशः ५६ और ६३ के तुल्य ही कहा है ।
भास्कराचार्य ने प्राचीनों के इस गणित को एक देशीय गणित कहा है । “ब्रह्म-
गुप्ताचार्य” के मत को आगम मानते हुये भी आचार्य ने सिद्धान्त पक्ष स्थापित करने में
सङ्कोच नहीं किया है । ब्रह्मगुप्त का निःसंकोच खण्डन भी किया है ।
भास्कराचार्य का कथन है कि—चतुर्भुज की चारों भुजाओं के मान नियत होने पर
भी उसके नियत कर्ण नहीं हो सकते । कर्णों की नियत स्थिति न होने से लम्ब मानों में भी
अन्तर पड़ता है, जिससे चतुर्भुज का क्षेत्रफल एक रूप का कदापि न होकर अवश्य
अनेक रूप का हो सकता है ।
जैसे, उक्त अ क ल प चतुर्भुज के अ क और ल क अथवा क कोण की दोनों भुजाओं
को भीतर की तरफ संकुचित करने से क ल और क अ भुजाओं के योग ७७ के तुल्य
तक कर्ण का परम मान होगा जो ब्रह्मगुप्त के मत से बृहत्कर्ण ६३ के तुल्य मानने पर
लघुकर्ण का मान केवल ५६ ही आता है ठीक है, किन्तु भास्कराचार्य का कथन है कि—
(१) चतुर्भुज के एकान्तर कोणों के खिंचाव से चतुर्भुज संकुचित होकर त्रिभुज के रूप
में परिणत हो जाता है । जैसे एक कोण में लगी हुई दो भुजाओं के योग के तुल्य आधार

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का मान हो जाता है । और चतुर्भुज की शेष दोनों भुजाएँ त्रिभुज की भुजाएँ बन
जाती हैं । दूसरा संकुचित कर्ण चतुर्भुज के लम्ब से कम नहीं होगा और वे दोनों भुजाएँ
आधार से बड़ी नहीं होगी । इस कथन के अनुसार ५६ की जगह पर कर्ण के ३२ मानने
से इसी चतुर्भुज का दूसरा कर्ण ७६ २२/२५ आता है । (सामने चित्र देखिये)
(२) इसी क्षेत्र को समलम्ब चतु-
भुज की स्थिति में रखने से ६० - २५ =
३५ को आधार मानकर, अन्तर्लम्ब
त्रिभुज के स्वरूप में ३५ आधार के दो
विभागों में एक विभाग का मान ३/५ और
दूसरे विभाग का मान १७२/५ होता है ।
तथा शीर्षकोण से आधार तक लम्ब का
मान √(३८०१६ / २५) आता है ।
आसन्नमूल लेने से लम्ब का मान ३८ २४/२५ आता है । √{(६० - ३/५)² + ३८०१६/२५}
आसन्न मूल ७१ १/१८ तथा √{(६० - १७२/५)² + ३८०१६/२५} आसन्न मूल ४६ २/३
यह द्वितीय कर्ण होता है ।

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( ७ )
उक्त स्पष्ट विवेचनों से भास्कराचार्य का कथन ("चतुरस्रे तेष्वेव बाहुष्वपरौ च
कर्णौ बहुधा भवतः'') इन्हीं भुजाओं में और भी कर्ण हो सकते हैं, तथा इन्ही भुजाओं से
निर्मित चतुर्भुज का क्षेत्रफल भी बहुत तरह का हो सकता है यह कथन युक्ति युक्त है।
आधुनिक अंक गणित में इस प्रकार की सूक्ष्म देनें यदि हैं तो वह सब भास्कराचार्य की
ही हो सकती हैं। यदि नहीं हैं तो गङ्गातट पर भी प्यासे होने की तरह आश्चर्य की ही
बात कहनी पड़ेगी।
लीलावती में वृत्तक्षेत्र गणित
वृत्तक्षेत्र गणित में ब्रह्मगुप्त श्रीपति-लल्लाचार्य प्रभृति गणितज्ञों से भास्कराचार्य का वृत्त
का क्षेत्रफल, वृत्त का पृष्ठफल और गोलक्षेत्र का घनफल विशेष उल्लेखनीय हो जाता है।
भास्कराचार्य ने वृत्त के व्यास और परिधि का (व्यास × ३९२७) / १२५० = वृत्त की
सूक्ष्म परिधि बताया है।
लाघव के लिए (व्यास × २२) / ७ = वृत्त की परिधि कही है। क्योंकि ३९२७ / १२५० का स्वल्पा-
न्तर मान २२ / ७ कहा है। आधुनिक विकास गणित के युग में व्यास परिधि का सम्बन्ध
दशमलीय गणित पद्धति से २२ / ७ = ३·१४२९७ होता है। यह सम्बन्ध भास्कराचार्य
का स्थूल सम्बन्ध है।
आचार्य ने स्वयं (व्यास × ३९२७) / १२५० से ३९२७ / १२५० = ३.१४१६, यही व्यास परिधि का
सूक्ष्म सम्बन्ध कहा है।

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( ८ )
भास्कराचार्य के पूर्ववर्ती श्री लल्लाचार्य ने वृत्तफल गुणित व्यास को गोल का पृष्ठ-
फल कहा है । गणित की इस महान त्रुटि पर भास्कराचार्य ने गोलाध्याय में बहुत विशद्
वर्णन के साथ गोलपृष्ठफल का सूक्ष्म गणित बताया है ।
उदाहरणतः—किसी वृत्त के व्यास का मान ७ है, उस वृत्त का वृत्तक्षेत्रफल उसका
पृष्ठफल और उसी वृत्त का घनफल क्या होगा ?
७ × ३९२७
यतः व्यास = ७ अतः ------------ = वृत्त की परिधि होती है ।
१२५०
परिधि × व्यास ७ × ७ × ३९२७ २४२३
------------------ = वृत्तफल = ------------------ = ३८--------- । वृत्तफल × ४ =
४ १२५० × ४ ५०००
७ × ३९२७ × ४ × ७ ११७३
कन्दुक जाल की तरह गोलपृष्ठफल = -------------------------- = १५३ = --------
१२५० × ४ १२५०
गोलपृष्ठफल × ७ ७ × ३९२७ × ७ × ४ ७ × ३९२७ × ७×४×७
-------------------- = गोलघनफल = ---------------------- = ----------------------------
६ १२५० × ४ × ६ १२५० × ४ × ६
१३४६९६१ १४८७
= ------------ = १७९ ------------ यह गोल का घनफल हो जाता है ।
७५०० २५००
भास्कराचार्य ने किसी वृत्त के ज्या और उत्क्रमज्या = जिसे शर या बाण भी कहते
हैं जानने का भी सरल गणित किया है । किसी वृत्त का व्यास = १० और उसमें
जीवा = ज्या = ६ है तो उसमें शर क्या होगा ?
इसका हल १० ± ६ = १६ × ४ = √६४ = ८
१० - १ = ९, ९ × १ = ९ का मूल = ३, ३ × २ = ६ जीवा हो जाती है ।
/ जीवा \²
विलोम गणित से जीवा और व्यास को जानकर ( ------- ) = ९ ÷ १ = ९, ९ + १ = १०
\ २ /
= व्यास मान स्पष्ट होता है । तथा किसी २००० व्यासमान के वृत्तान्तर्गत समभुज
त्रिभुज से समनवभुज क्षेत्र तक की भुजाओं के ज्ञान के लिए, वृत्त के व्यास को क्रमशः
१०३९२३······८४८५३······४१०३१ गुणाकर १२०००० से भाग देने पर उक्त
त्रिगुणादि नवभुजान्त क्षेत्र की प्रत्येक भुजा ज्ञात हो जाती है ।
लीलावती में अंकजाल या अंकपाश गणित
अङ्कपाश को अंकजाल के रूप में भी निर्देशित किया जा सकता है । आधुनिक विक-
सित गणित में इस गणित का महत्वपूर्ण स्थान है । १ से लेकर ९ संख्या तक के अङ्कों
के विभिन्न स्थानों से उनके भेद, उनके योग आदि का ज्ञान करने के अध्याय को
भास्कराचार्य ने अङ्कपाशाध्याय जिसे अङ्कों के जाल का अध्याय कहा है । उदाहरण से
भी अनन्तरूपी भगवान विष्णु का एक सीमित रूप चतुर्भुज (चतुर्बाहु) भी है ।

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यद्यपि शंख, चक्र, गदा और पद्म चार आभूषणों १, २, ३, ४ से युक्त-भगवान्
विष्णु का १ ही रूप होता है। यदि अन्योन्य हाथों में शंख, गदा, चक्र और पद्म को
धारण किया जाय तो भगवान् विष्णु के अखंड १ रूप से अन्य कितने रूप हो सकते हैं
इन रूपों को भी गणित से निम्न भाँति जाना जा सकता है।
आभूषण संख्या = १, २, ३, ४
अतः १ x २ x ३ x ४ = २४ भेद या भगवान विष्णु के २४ अवतार हो जाते हैं।
इसी प्रकार भगवान शंकर के प्रसिद्ध १० आसन या आभूषण धारण की स्थायी
स्थिति में सभी आभूषणों का अन्योऽन्य हस्त परिवर्तन से धारण परिवर्तन किया जाय तो
अखण्ड एक रूप के अतिरिक्त भगवान शङ्कर के कितने रूप हो सकते हैं ?
चूंकि भगवान शङ्कर के दश हाथों में (१) पाश, (२) अङ्कुश, (३) सर्प, (४) डमरू,
(५) कपाल, (६) त्रिशूल, (७) खट्वाङ्ग, (८) शक्ति, (९) शर और (१०) धनुष को
प्रत्येक हाथ से बदल बदल कर रखने से भगवान शङ्कर के १x२x३x४x५x६x७x८x
९x१० = ३६२८८०० (छत्तीस लाख अठाईस हजार आठ सौ) रूप होते हैं, यह कैसे ?
इत्यादि भेदों को सुविधा से समझने के लिये एक छोटे से उदाहरण ८२, और २८ = २८
३, ९, ८ अङ्कों से बनी संख्याओं को कितने बार लिख सकते हैं और उनका योग भी
क्या होगा ? यह एक प्रश्न है।
यह छोटा अङ्क जैसे २८ है तो इसे हम २८ और ८२ भी लिखकर इस अंक के
भेद = २ और भेद के अंकों का योग = ८२ + २८ = ११० योग कह सकते हैं।
जैसे यहाँ पर, अंक २ हैं जिनका योग = १० है, इसलिये १ x २ = २ स्थान = भेद—
आगे सूत्र से, (भेद x स्थान / अंकमान) अंकभेद = १ x २ = २, अङ्कयोग = ८ + २ = १०,
अङ्कमान ८२ = २ ही अङ्क है।
इसलिये (अंकभेद x अंकयोग / अंकस्थान) = २x१० / २ = १० को एक स्थान दाहिनी तरफ बढ़ा-
कर लिखने से १० / ११० यही अंकभेद और उनका योग हो जाता है। छोटा अंक होने से
स्पष्ट समझ में आ जाता है। २८ की तरह और ८२ की तरह लिख सकते हैं और
२८ + ८२ का योग उक्त ११० तुल्य हो जाता है।
भगवान विष्णु के रूप भेद = १ x २ + ३ x ४ = २४ अंक योग = १० और अंक-
मिति = ४। इसलिए सूत्र से २४ x १० / ४ = ६० को ४ जगह दाहिने एक स्थान बढ़ाकर
लिखने से—

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( १० )
६ ०
६ ०
६ ०
६ ०
————————
६ ६ ६ ६ ०
अंकभेद ज्ञानगणित में तुल्य अंकों के पृथक् भेदों से समग्र भेदों में भाग देने से लब्ध
तुल्य अंक के सही भेद होते हैं।
जैसे—४८५५५ यही अंक है तो पूर्व नियमानुसार १×२×३×४×५ = १२० भेद
होते हैं। किन्तु ५५५ इनके १×२×३ = ६ भेदों से १२० में भाग देने से १२०/६ = २०
भेद होंगे अतः ४८५५५, ४५८५५, ४५८८५.... २४ के तुल्य लिखकर योग करना
कठिन होने से ४+८+५+५+५ = २७ को भेद से गुणाकर अंक स्थान ५ से
भाग देने पर (२७ × २०) / ५ = १०८ को एक स्थान से हटाकर ५ जगह लिखकर योग
१०८
१०८
१०८
१०८
१०८
१०८
——————————————
१ १ ९ ९ ९ ९ ८ ८
के तुल्य अंक योग हो जाते हैं। आज के युग में गणितविद्या के इस गणितसागर का नाम
संभवतः स्टैटिक्स कहा जाता होगा ?
भास्कराचार्य इस गणित के विषय में कहते हैं—
“न गुणो न हरो, न कृतिर्नघनः पृष्टस्तथापि दुष्टानाम्।
गर्वितगणकबहूनां स्यात्पातोऽवश्यमङ्कपाशेऽस्मिन् ॥”
अर्थात् इस गणित में गुणन भजन वर्ग रचना··· आदि कोई नियम न होने पर भी
गणिताभिमानी, गर्वी गणितज्ञों के लिये यह एक शिर झुकाने का विषय अवश्य हो
जाता है।
श्री भास्कराचार्य के अप्रतिम गणित पाण्डित्य प्रकाशन पर कुछ विद्वान लेखकों,
शोधकर्ताओं ने अपने प्रकाशनों पर “लीलावती” ग्रन्थ के सम्बन्ध में ‘लीलावती’ नामक
भास्कराचार्य की कन्या का उल्लेख किया है। जिसे देखकर क्लेश व कष्ट होना
स्वाभाविक है। ग्रन्थ के आमूलचूड़ अध्ययन की उपेक्षा होने से लेखकों आदि द्वारा

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( ११ )
"लीलावती को भास्कराचार्य की कन्या है" ऐसा कहना बड़ा भ्रामक एवं तथ्यों से बहुत
दूर हैं । अतएव उदाहरणार्थ 'लीलावती' ग्रन्थ के कतिपय चमत्कारिक प्रश्नों के हल के
साथ यत्र-तत्र आये हुये सम्बोधनों आदि का उल्लेख विज्ञपाठकों के मनन तथा विचारार्थ
प्रस्तुत कर रहा हूं—
१--अंकों के योग उदाहरण के अवसर पर भास्कराचार्य अपनी 'लीलावती' नामक
पत्नी से प्रश्न करते हैं—
"अये बाले ! लीलावति ! मतिमति ब्रूहि सहितान् !" इत्यादि
२, ५, ३२, १९३, १८, १० और १०० अंकों का एकीकरण कितना होगा ?
साथ ही 'शतोपेतानेतानयुत वियुतांश्चापि वद मे । यदि व्यक्ते युक्तिर्व्यवकलन मार्गेऽसि
कुशला' । उक्त योगांक को १००० में घटाने से क्या फल होगा ? एक ही श्लोक में
अंको के स्थानीय मानो के अनुसार योग और अंतर का अत्यंत सुन्दर उदाहरण
उपस्थित किया गया है । ( योग, ३६० इसे १००० में घटाने से अंतर = ६४४ )
२—"सखे नवानां च चतुर्दशानां ब्रूहित्रीहीनस्य शतत्रयस्य ।
पंचोत्तरस्याप्ययुतस्य वर्गं जानासि चेद्वर्गविधानमार्गम् ॥
उपरोक्त श्लोक में भास्कराचार्य कह रहे हैं कि हे मित्र ( सखे ) यदि तुम वर्ग
करने की विधि जानते हो, तो ९, १४, २९७ और १०००५ का वर्ग बताओ ? यदि
लीलावती उनकी पुत्री होती तो वे पुत्री या लीलावती सम्बोधन कर सकते थे न कि
सखे ! सम्बोधन करते ।
३—इसी प्रकार अन्यत्र भी सखे ! सम्बोधन का व्यवहार किया गया हैं ।
"नवघनं त्रिघनस्य घनं तथा कथयस्यपञ्चघनस्य घनञ्च में ।
घन पदं च ततोऽपि घनात्सखे । यदिघनेऽस्ति घना भवतो मतिः ॥
अर्थात हे सखे घनमूल जानने में यदि तेरी बुद्धि घनी है तो ९ का घन और ३ के
घन का २७ का घन का और ५ के घन १२५ का घन आगत अंको का धनमूल भी
बताओ ।
४—व्यस्त गणित के उदाहरण में—
यस्त्रि घ्नस्त्रिभिरन्वितः स्वचरणैर्भक्त स्ततः सप्तभिः
स्वत्र्यंशेन विवर्जितः स्वगुणितो हीनो द्विपञ्चाशता ।
तन्मूलेऽष्टयुते हृतेऽपि दशभिर्जातं द्वयं ब्रूहि तं
राशिं वेत्सि हि चंचलक्षि ! विमलं बाले ! विलोमक्रियाम् ॥

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( १२ )
वह कौन सी राशि है जिसे ३ से गुणा कर उसमें अपना ३/४ जोड़कर ७ से भाग
देकर उसीका तीसरा भाग उसमें घटाकर शेष के वर्ग में ५२ घटाकर उसके मूल
में ८ जोड़कर १० से भाग देने पर वह अंक २ होता है। हे बाले हे चंचलाक्षि
यदि तुम विलोम विधि गणित जानती हो, तो वह राशि बताओ ।
यहाँ राशि का स्वांश अधिक या न्यून की जगह पर युत में ३/४ की जगह ३/७ और
ऋण में १/३ की जगह १/२ समझिये ।
२ × १० = २०, २० - ८ = १२, ( १२ )² = १४४, १४४ + ५२ = १९६,
१९६ का मूल = १४, १४ + १४/२ = २१ और २१ × ७ = १४७, १४७ - (१४७ × ३)/७
१४७ - ६३ = २८ यह दृश्य राशि उत्तर होता है ।
आचार्य ने जो व्यस्त गणित का सिद्धांत बताया है, तदनुसार उत्तर के साथ यहाँ
पर भी सम्बोधन में चंचलाक्षि ! बाले ! आदि सम्बोधन लड़की को सम्बोधन कहना
उचित नहीं है ।
५—विश्लेष जाति का उदाहरण—
“पञ्चांशोऽलि कुलात्कदम्बमगम”दिति —
“हे मृगाक्षि ! हे कान्ते”!''''इत्यादि सम्बोधनों से बोधिता पत्नी ही कही जायेगी ।
भ्रमर समूह से उड़कर भ्रमर समूह का १/५ कदम्ब पुष्पों में, १/३ शिलीन्ध्र पुष्प में
दोनों का त्रिगुणित अन्तर कुटज पुष्प में चला गया, जब उसी भ्रमर कुल में शेष १ भ्रमर
रह गया तो वह भी अपने परिवार वियोग में उड़कर पारिवारिक सदस्यों की गवेषणा
कर ही रहा था एक स्थल पर केतकी और मालती पुष्प वृक्षों ने उस भ्रमर को
आकृष्ट किया जब वह मालती में पहुँच ही रहा था तो द्वेष से केतकी के गहन
सुगन्धाकर्षण ने उस भ्रमर को अपने में आकृष्ट कर लिया और केतकी तक पहुँच,
स्पर्श को समझ कर मालती ने पुनः ऐसा सौरभ फैलाया कि भ्रमर पुनः मालती की
ओर आही रहा था कि पुनः केतकी की हरकत शुरू हो गयी, तात्पर्य कि भ्रमर
आकाश में केतकी और मालती के मध्य में एक दूसरे के संदेश वाहक ( दूत ) की
तरह हो गया । बताओ भ्रमर संख्या क्या थी···गणित सरल है १५ उत्तर आता है
पर साहित्यक दृष्टि से यह स्पष्ट हो रहा है कि दो भार्यायों के बीच का नायक अकर्मण्य
हो जाता है । एक पत्नी व्रती ही सुखी रहता है, इत्यादि साहित्य के रस प्रवाह का
अंकगणित लड़की को पढ़ाया जाना क्या संभव है ? मर्यादा का ख्याल होना चाहिए,
पत्नी के साथ ही यह रसास्वाद सम्पन्न अंकगणित का व्याख्यान समीचीन होता है ।

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( १३ )
गणित का यह निम्न उदाहरण यदि प्रक्षिप्त है तो भी तथा कुछ विद्वान् इस पद्य
गणित को भास्कराचार्य की ही कृति कहते हैं ।
६—कामिन्या हारवत्याः सुरतकलहतो मौक्तिकानां त्रुटित्वा ।
प्राप्तः षष्ठः सुकेश्या गणक दशमकः संगृहीत प्रियेण ॥ इत्यादि
हे गणितज्ञ ! सुरत कलह में किसी कामिनी की मोतीमाला के टूट जाने से उस
का १/३ जमीन पर १/५ विस्तर पर और १/६ कामिनी को, १/१० स्वामी ( पतिको और शेष
६ तागे में गुथे रह गये तो मोती संख्या क्या थी ? क्या इस प्रकार के प्रश्नोत्तर
लड़की को पढ़ाये या लड़की से पूछे जा सकते हैं ।
७—"बाले ! मरालकुल मूल दलानि समतीरे" इत्यादि
हे बाले ! किसी सरोवर के हंस समूह का ७/२ क्रीडा की थकावट के शिथिलगमन से
सरोवर के तट पर देखा गया, शेष हंसों को जल में क्रीडा कलह करते देखा गया तो हंस
कुल का प्रमाण संख्या क्या है ? मूल संख्या का गुणक ७/२ और दृश्य = २, गणित क्रिया
से ५६/१६ में + २ गुणकार्थ ७/२ × १/२ = ७/४ का वर्ग ४९/१६ में दृश्य २ का योग ८१/१६ का मूल =
९/४ में गुणकार्थ ७/४ + जोड़ने से १६/४ = ४ का वर्ग = १६ हंस संख्या यही हंस कुल
प्रमाण होता है ।
८—पुनश्च लड़की से नहीं स्त्री से ही प्रश्न और गणित कौशल सूचक उदाहरण
और क्रिया —
वर्षा ऋतु के समय हे बाले ! हंस कुल का दश गुणित मूल मानस सर में
और उसी का १/८ जल के किनारे से उड़कर स्थल कमलिनी वन में, शेष ३ हंस
का जोड़ा ( = ६ ) कोमल कमलनाल सुशोभित जल में क्रीड़ा की लालसा के देखे
गये तो हंस संख्या क्या है ?
उत्तर १ - १/८ = ७/८ । ६ ÷ ७/८ = ४८/७ = नूतन दृश्य, तथा १० ÷ ७/८ = ८०/७ नया
गुणांक, ८०/७ ÷ २ = ४०/७ का वर्ग = १६००/४९ में ४८/७ को जोड़ने से १९३६/४९ का मूल
= ४४/७ अतः ४०/७ + ४४/७ = ८४/७ = १२ का वर्ग हंस कुल प्रमाण = १४४ होता है ।
९—अपि च स्त्री से सम्बन्धित गणित और उत्तर—
अलिकुलदलमूलं मालती यातभृङ्गौ —
निखिल नवम भागाश्चालिनीं भृङ्गमेकम्
निशिपरिमललुब्धं पद्ममध्ये निरुद्धम्
रणति प्रति रणन्तं ब्रूहि कान्ते ! ऽलिसंख्याम् ।
हे कान्ते ! भ्रमर झुण्ड का १/९ भाग तथा झुण्ड का १/२ के मूल के बराबर मालती
पुष्प पर गये, सुगन्धि के प्रलोभन से कमल पुष्प कोश में ग