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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' नाथ सम्प्रदाय का एक प्रमुख संस्कृत ग्रन्थ है, जो परम्परा से गुरु गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) की रचना माना जाता है। इसमें नाथ योगियों का दर्शन व्यवस्थित रूप में मिलता है, जिसका केन्द्रीय विचार यह है कि शरीर (पिण्ड) और ब्रह्माण्ड एक ही तत्त्व के दो रूप हैं, और योगी अपने शरीर के भीतर ही परम पद का अनुभव कर सकता है।

ग्रन्थ छह उपदेशों में है: पिण्ड की उत्पत्ति, जिसमें परमपद से शक्ति के विकास का क्रम बताया गया है; पिण्ड-विचार; पिण्ड-संवित्ति, अर्थात् शरीर में तीर्थों और देवताओं की अनुभूति; पिण्ड के आधार, जिसमें नौ चक्र, सोलह आधार, तीन लक्ष्य और पाँच व्योम आते हैं; पिण्ड और परमपद का समरस भाव; और अवधूत योगी के लक्षण।

यह हिन्दी अनुवाद सहित संस्करण गोरखनाथ मन्दिर, गोरखपुर से प्रकाशित हुआ है। आरम्भ में मन्दिर के गर्भगृह में जलने वाली अखण्ड ज्योति का चित्र है, जिसे परम्परा गोरखनाथ जी द्वारा प्रज्वलित मानती है। फिर ग्रन्थ के छठे उपदेश से लिया गया गणपति-स्तवन श्लोक हिन्दी अर्थ के साथ दिया गया है। अनुवादक का नाम आरम्भिक पृष्ठों में नहीं मिलता। कुल २२२ पृष्ठ हैं।

नाथ निरंजन की आरती
नाथ निरंजन आरती साजै ।
गुर के सबदूं झालरि बाजै ॥ टेक ॥
अनहद नाद गगन में गाजै ।
परम जोति तहां आप विराजै ॥ १ ॥
दीपक जोति अखंडत बाती ।
परम जोति जगै दिन राती ॥ २ ॥
सकल भवन उजियारा होई ।
देव निरंजन और न कोई ॥ ३ ॥
अनत कला जाकै पार न पावै ।
संष मृदंग धुनि बेनि बजावै ॥ ४ ॥
स्वाति बूंद लै कलस बंदाऊँ ।
निरति सुरति ले पहुप चढ़ाऊँ ॥ ५ ॥
निज तत नांव अमूरति मूरति ।
सब देवां सिरि उदबुदि सूरति ॥ ६ ॥
आदिनाथ नाती मच्छेन्द्रनाथ पूता ।
आरती करै गोरष अवधूता ॥ ७ ॥
[ गोरखबानी पद—६२ ]

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