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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 85 of 222

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आकाश चक्र में शिव सायुज्य अथवा अलख निरंजन परम ज्योति स्वरूप स्वसंवेद्य
परमेश्वर के साक्षात्कार का वर्णन किया है ।
स्रवत् पीयूषसम्पूर्णे लम्बिकाचन्द्रमण्डले ।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा मृत्युं विमुञ्चति ॥
( विवेकमार्तण्ड १७३ )
लम्बिका-स्थान में स्थित चन्द्रमण्डल से स्रवित पीयूष में आत्मा का ध्यान
कर योगी नासा के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर करता है और मृत्यु के भय से रहित
हो जाता है ।
सप्तमं भ्रूचक्र मध्यममंगुष्ठमात्रं ज्ञाननेत्रं दीपशिखाकारं
ध्यायेद् वाचां सिद्धिर्भवति ॥ ७ ॥
सातवाँ भ्रूचक्र है । ( यही आज्ञाचक्र कहा जाता है । यह दोनों भौंहों के
मध्य में स्थित है, इसलिये मध्यम चक्र कहा गया है । ( यह दो दलों वाला कमल
है । ) इस भ्रूचक्र के मध्य में दीपशिखा के आकार वाला एक अंगुल का ज्ञाननेत्र
( तृतीय नेत्र ) है । इस ज्ञाननेत्र का ध्यान करने से योगी वाक्सिद्ध हो जाता
है, वह जो कुछ कहता है, वह व्यर्थ नहीं होता ॥ ७ ॥
गोरक्षसंहिता में महायोगी गोरखनाथजी ने आज्ञाचक्र में माणिक्य की
शिखा के समान आत्मा में नासाग्रदृष्टि से ध्यान करने का फल आनन्दमय
होना बताया है । इस आज्ञाचक्र में नीलवर्ण के शिव का ध्यान कर योगी प्राण
को वश में कर जीव-शिव का ऐक्य सम्पादित करता है। नासिका के अग्र भाग
में निर्गुण, शान्त, विश्वतोमुख, आकाश के समान व्याप्त शिव का ध्यान कर
ब्रह्ममय हो जाता है । आज्ञाचक्र की स्थिति भौंहों के मध्य में है । भौंहों के
मध्य के स्थान को आकाश कहा जाता है, इस चक्र के देवता शिव हैं; उनका
ध्यान कर योगी मुक्ति प्राप्त करता है ।
भ्रुवोरन्तर्गतं देवं सन्माणिक्यशिखोपमम् ।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वानन्दमयो भवेत् ।
ध्यायन्नीलनिभं नित्यं भ्रूमध्ये परमेश्वरम् ।
आत्मानं विजितप्राणो योगी योगमाप्नुयात् ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४३