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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

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शिवशक्ति का नादरूप अथवा ध्वनिरूप है। इस स्तर पर योगी नादों की
अनेकता को पार कर शाश्वत शिव-शक्ति के तादात्म्य का अनुभव करता है।
षष्ठं तालुचक्रं तत्रामृतधाराप्रवाहः घण्टिकालिङ्गमूल-
रन्ध्रराजदन्तं शंखिनोविवर दशमद्वारं तत्र शून्यं ध्यायेत्,
चित्तलयो भवति ॥ ६ ॥
छठाँ तालुचक्र है, वहाँ ( सहस्रदलस्थित चन्द्रमण्डल से ) अमृत प्रवाहित
होता रहता है । ( उस अमृत की बूंदें तालु की विशेष नाड़ियों में झरती रहती
हैं । ) मुख खोलने पर जो मांस खण्ड दीखता है, वही घण्टिका है, जो लिंग के
समान है, उसके मूल से लेकर तालुपर्यन्त राजदन्त नाम का बिल है, यही शंखिनी
विवर कहा जाता है । ( यहाँ शंखिनी नाड़ी का सम्बन्ध है । ) यह दसवें द्वार
का मार्ग है, यहाँ शून्य ( निर्गुण-निराकार अलख-निरञ्जन परमेश्वर ) का
ध्यान करना चाहिये । यहाँ शून्य का ध्यान करने से चित्त लय को प्राप्त
होता है ॥ ६ ॥
विशेष—महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि तालुचक्र तालूमूल में स्थित
हैं । इस चक्र में सहस्रार से सतत अमृत की धारा प्रवाहित होती रहती है ।
योगी अपनी मानसिक जैविक शक्ति को इस चक्र में समुचित प्रणाली से एकाग्र
कर इस अमृत का पान कर क्षुधा-पिपासा से मुक्त होकर शरीर दिव्य कर लेता
है, भौतिक अमृतत्व प्राप्त कर लेता है, इस चक्र में शून्य पर ध्यान केन्द्रित करना
चाहिये, जिससे चित्तलय की स्थिति की प्राप्ति हो सके । पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान
प्राप्त करने के लिये और चेतना को परमात्ममय कर देने के लिये चित्तलय एक
महान् सोपान है । तालूमूल में एक घंटिका लिंग है, जिसके मूल में एक लघु
छिद्र है, एक पूर्ण रिक्त स्थान शंखिनी विवर है. यह दसवाँ द्वार है, यहीं शून्य पर
धारणा करने से समाधि के फलस्वरूप चित्त विलीन हो जाता है, इसमें ध्यान
करने से व्यावहारिक चेतना समाप्त हो जाती है और पारमार्थिक ज्योति आलो-
कित हो उठती है ।
इसी चक्र से योगी को सहस्रार से द्रवित अमृतपान सुलभ होता है ।
गोरखनाथ ने इस चक्र के ऊपर भ्रूचक्र ( आज्ञा चक्र ) और निर्वाण-चक्र तथा
४२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति