सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextपाँचवां गुण प्रत्यङ्मुखता (सृष्टिकर्मसम्पादन में नित्य तत्परता) है। सृष्टिकर्म
के सम्पादन की सम्पूर्ण सामग्री की परिपूर्णता प्रत्यङ्मुखता है ॥१४॥
परपिण्डोत्पत्ति
एवं शक्तितत्त्वे पञ्च पञ्च गुणयोगात् परपिण्डोत्पत्तिः ॥ १५ ॥
इस तरह शक्तितत्व में प्रत्येक (निजा शक्ति, पराशक्ति, अपराशक्ति, सूक्ष्मा-
शक्ति और कुण्डलिनो शक्ति) के पाँच-पाँच गुण, धर्म अथवा अवस्था (पचीस
गुणों) में परपिण्ड (सगुण-साकार परमेश्वर के पिण्ड) की उत्पत्ति (प्राकट्य
अथवा आविर्भाव) होती है। (जिस तरह हमारा पाञ्चभौतिक शरीर पञ्च
भूतों का पिण्ड है और उसका अधिष्ठाता जीवात्मा है, इसी तरह शक्ति के पचीस
गुणों वाले परपिण्ड-व्यापक पिण्ड का अधिष्ठाता सगुण साकार परमेश्वर है।)
परपिण्ड में व्याप्त यह परमेश्वर सर्वज्ञ, चैतन्यस्वरूप, कूटस्थ, असंग, सत्स्वरूप
में जगत् की सृष्टि, पालन और संहार के लिए अभिव्यक्त अथवा प्रकट है।
उत्पत्ति का तात्पर्य आविर्भाव है, उत्पत्तिधर्मी का विनाश होता है, परपिण्ड की
उत्पत्ति विनाशधर्मी नहीं है यह लय को प्राप्त होता है। साकार-सगुण परमेश्वर
का पिण्ड द्वैताद्वैतविवर्जित अलख निरञ्जन, परमेश्वर में लय को प्राप्त हो जाता
है, उसका विनाश नहीं होता है ॥ १५ ॥
उक्तञ्च—
निजापराऽपरासूक्ष्माकुण्डलिन्यासु पञ्चधा ।
शक्तिचक्रक्रमेणोत्थो जातः पिण्डपरः शिवः ॥ १६ ॥
निजा, परा, अपरा, सूक्ष्मा और कुण्डलिनी, इन पांच शक्तियों में शक्तिचक्र
क्रम द्वारा सदाशिव पाँच प्रकार से प्रकट होते हैं। एक-एक शक्ति के विकास से
एक-एक पिण्ड आविर्भूत होता है, इन पाँच पिण्डों के अधिष्ठातारूप पाँच देव होते
हैं, यही शक्तिचक्र-क्रम है, शक्तिचक्रत्रिकोण में विन्दु रहता है, विन्दु से आशय है
अविकृत कारण, आदिनाथ परमेश्वर, परब्रह्म शिव, सदाशिव की शक्ति के विकास
के समय यह शक्ति इच्छा, ज्ञान, क्रिया का रूप धारण करती है। इन तीनों
(गौरी, लक्ष्मी, सरस्वतीरूपिणी) शक्तियों से परमेश्वर व्यापक शिव का आविर्भाव
होता है ॥१६॥
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