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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 48 of 222

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निरंशता, निरन्तरता, निश्चलता, निश्चयता, निर्विकल्प-
तेति पञ्चगुणा सूक्ष्मशक्तिः ॥ १३ ॥
परमेश्वर शिव की सूक्ष्मा शक्ति के पाँच गुण—अवस्था अथवा धर्म हैं।
(यह सूक्ष्म शक्ति विद्यारूप विमर्शशक्ति है ।) इसका पहला गुण निरंशता है। इसमें
अयं (यह) और त्वम् (तुम) के व्यवहार का अभाव है, सृष्टि के पहले निरंशता
शक्ति सूक्ष्म रूप से 'अहम्' के रूप में अन्तर्लीन रहती है, सृष्टि के बाद 'एकोऽहं
बहुस्याम' के रूप में यह व्यवहार में अभिव्यक्त होती है। दूसरा गुण निरन्तरता
है। यह देश-कालकृत व्यवधान से शून्य होने के कारण परमेश्वर में निरन्तर
नित्य अभिव्यक्त है। तीसरा गुण निश्चलता है, यह अच्युत है, आदिनाथ शिव में
सम्पूर्ण अभिव्यक्त होकर व्याप्त है। चौथा गुण निश्चयता है, सत्वरूप की
अभिव्यक्ति है, संशय, भ्रम, द्वन्द्व आदि दोष से रहित सच्चिदानन्दस्वरूप बोध
की योगज्ञानमयी शक्ति है, निरञ्जनता है। पाँचवां गुण निर्विकल्पता है, सृष्टि के
पहले सिसृक्षा की संकल्प-शक्ति के रूप में परमेश्वर शिव में विशेष्य-विशेषण
(उपाधि) रहित स्वाभिव्यक्त है ॥ १३ ॥
पूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्चलता प्रत्यङ्मुखतेति
कुण्डलिनी शक्तिः ॥ १४ ॥
(कुण्डलिनी महाशक्ति सहस्रार से भी परे आकाश चक्र में स्वस्थ
आदिनाथ, अलख निरंजन, परमेश्वर की ज्योतिस्वरूपिणी, नित्य विहारिणी,
शाश्वत लीलाधारिणी परमेश्वरी है ।) यह परमेश्वर में नित्य सच्चिदानन्द
स्वरूपिणी होने से पूर्ण है, अखण्ड, अनन्त, शाश्वत एकरस है। इसका पहला
गुण पूर्णता है। यह सर्वव्यापक, अपरिच्छिन्न और नित्य है । शब्द-अर्थरूपगत
इसका परिणाम होना ही इसकी प्रतिबिम्बता है। प्रतिबिम्बता इसका दूसरा
गुण है। योगी द्वारा नवचक्रादिभेदनपूर्वक इसका प्रबोधन—जागरण होने पर
ज्योतिरूप में उसके शरीर में यह महाशक्ति प्रतिबिम्बित हो उठती है । योगी के
शरीर का तेजोमय रूप में ज्योतित होना ही कुण्डलिनी की प्रतिबिम्बता है।
कुण्डलिनी शक्ति का तीसरा गुण प्रबलता है। यह गुण उसके महाशक्तिसम्पन्न
होने का प्रतिपादक है। चौथा गुण प्रोच्चलता है । यह नित्य वर्धमान है,
सुप्ताकार से जागृति—प्रबोधनरूप में नित्य-निरन्तर ज्योतित अथवा अभिव्यक्त होती
रहती है । यह सदाशिव में सायुज्यलाभमयी होकर ऊर्ध्वमुखी रहती है।
६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति