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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 202 of 222

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न वन्दनीयास्ते काष्ठा दर्शनभ्रान्तिकारकाः ।
वर्जयेत्तान् गुरून् दूराद् धीरः सिद्धमताश्रयः । ७२ ।
इस तरह समस्त मतों का—सिद्धान्तों का परब्रह्म सच्चिदानन्द में समन्वय—
सम्यक् तात्पर्य का बोध करानेवाला अवधूत सद्गुरु ही प्रशंसनीय है । समस्त
दर्शनों के मत में समन्वय के द्वारा इन उपदेशों से वास्तविक विश्रान्ति की
उपलब्धि होती है । विश्रान्तिरूप ( समन्वयात्मक ) निरुत्थान --निर्विकल्प समाधि
से शोभित परब्रह्म परमेश्वर में योगी लीनता को प्राप्त करता है—ब्रह्मस्वरूप हो
जाता है, वह इससे योगिराज हो जाता है, इसलिये ऐसे परब्रह्मस्वरूप योगी
की ही वन्दना-पूजा करनी चाहिये । ऐसा करने पर योगसाधक अपने गुरु के
ज्ञानोपदेश से तत्क्षण सिद्धपद प्राप्त कर लेता है । जो ब्रह्मदर्शन--स्वरूपबोध
कराने में, सदुपदेश देने में असमर्थ हैं और शिष्यों को द्वैतप्रपंच में उलझाकर
दिग्भ्रमित करते रहते हैं, उन अविवेकी ( बुद्धि से जड़ ) गुरुओं का सिद्धमत पर
चलनेवाले साधकों द्वारा दूर ही से त्याग करना चाहिये, वे अज्ञान-अन्धकार में
भरमाने वाले गुरु किसी भी स्थिति में वन्दनीय नहीं हैं ॥ ६६-७२ ॥
सिद्धमत का आश्रय
वेदान्ती बहुतर्ककर्कशमतिर्ग्रस्तः परं मायया
भाट्टाः कर्मकलाकुला हतधियो द्वैतेनवैशेषिकाः ।
अन्ये भेदरता विवादविकलाः सत्तत्वतो वञ्चिता-
स्तस्मात्सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ७३ ।
( महायोगी गोरखनाथजी ने सिद्धमत--योगमार्ग की श्रेष्ठता का प्रतिपादन
किया है, सिद्धमत मार्ग की ही वरणीयता पर विशेष बल दिया है । ) वेदान्ती
कर्मोपासना आदि का त्याग कर शब्दजाल—प्रमाण आदि का आश्रय ग्रहण कर
द्वैतवाद का खण्डन करते हैं और अद्वैत का मण्डन करते हैं, उनकी मति कठोर
तर्कों से ग्रसित रहती है और वह निदिध्यासन से वहिर्मुख हो जाती है ।
( यद्यपि वे मायावाद का खण्डन कर जगत् को मिथ्या और ब्रह्म को सत्य कहते
हैं तथापि माया में भ्रमित होकर अखण्ड ज्ञानस्वरूप आत्मतत्व से वंचित रहते
हैं । ) पूर्वमीमांसक केवल यज्ञादि कर्म में तत्पर रहते हैं । वैशेषिक आदि दर्शनों के
मर्मज्ञ द्वैताग्रह से सद्बुद्धि को कुण्ठित कर देते हैं, इसी तरह अन्य मत-मतान्तरों
१६० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति