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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 191 of 222

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अवधूत की सर्वस्वरूपता
अत्याश्रमी च योगी च ज्ञानी सिद्धश्च सुव्रतः ।
ईश्वरश्च तथा स्वामी धन्यः श्रीसाधुरेव च । २१ ।
जितेन्द्रियश्च भगवान् स सुधी कोविदो बुधः ।
चार्वाकश्चार्हंतश्चेति तथा बौद्धः प्रकाशवित् । २२ ।
तार्किकश्चेति सांख्यश्च तथा मीमांसको विदुः ।
देवतेत्यादि विद्वद्भिः कीर्तितः शास्त्रकोटिभिः । २३ ।
आत्मेति परमात्मेति जीवात्मेति पुनः स्वयं ।
अस्तितत्त्वं परं साक्षाच्छिवरुद्रादिसंज्ञितम् । २४ ।
अवधूत अपने स्वसंवेद्य, द्वैताद्वैतविलक्षण, अखण्ड आत्मस्वरूप में आत्मस्थित
रहता है, इसलिये वह आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) की
अवस्थाओं से परे होने से अत्याश्रमी कहा जाता है, वह (स्वरूप-) ज्ञानी-
तत्वविद्, सिद्ध और योगसाधना-व्रत में—जगन्मात्र को परमात्मस्वरूप समझने में
दृढ़ होता है। वह सृष्टि, पालन (स्थिति) और संहार में (शक्तियुक्त होने से
साक्षात्) ईश्वर होता है, वह स्वामी (आत्मनिग्रही) होता है, वह सर्वदा
कृतार्थ और साधु होता है। वह जितेन्द्रिय, आत्मज्ञ, सद्बोधयुक्त, तत्वचिन्तक
और सर्वतन्त्रस्वतन्त्र साकार-सगुण भगवान् (सर्वसमर्थ) होता है। वह समस्त
नास्तिक-आस्तिक दर्शन में आत्मबुद्धि रखने के कारण सब में अखण्ड आत्मस्वरूप
में समाहित रहने वाला, चार्वाक (सांसारिक विषय-भोग-प्रवृत देहात्म-
वादी), आत्मस्वरूप को प्राप्त अर्हंत (जैन), स्वात्मप्रकाश में प्रबुद्ध होकर
भी (बुद्धिवृत्तरूपक्षणिक आत्मविज्ञानवादीसुगत) बौद्ध, न्यायवैशेषिक दर्शनाव-
लम्बी परिणामवादी, सांख्यवादी (तत्त्वनिष्ठ) ज्ञानी, कर्मकाण्ड को ही
परमफल प्राप्ति कराने वाले साधन में निष्ठ पूर्वमीमांसक, संसार का कारण देवता,
स्वभाव, काल, कर्म समझने वाले अनेकानेक शास्त्रों और विद्वानों के विचार का
समर्थक, वह योगी अवधूत आत्मदर्शन में स्वस्थ होने से सर्वस्वरूप होता है।
आत्मा, परमात्मा, जीवात्मा, स्वस्वरूप, शिवरुद्र-नामयुक्त साक्षात् सर्वात्मा ही
अवधूत योगी होता है ॥ २१-२४ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १४६