सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextहमारे व्यष्टि-पिण्ड के नवद्वारों में नवखण्ड स्थित हैं। (जिस तरह
ब्रह्माण्ड-शरीर में नौ खण्ड हैं, उसी तरह हमारे व्यष्टि-पिण्ड के नौ द्वारों में ये
खण्ड विद्यमान हैं।) मूल (गुदा) द्वार में भारत खण्ड, उपस्थ (लिङ्ग छिद्र)
में काश्मीर खण्ड, मुख में कर्पर खण्ड, नासिका के दाहिने रन्ध्र (छिद्र) में
श्रीखण्ड और बायें रन्ध्र में शंखखण्ड, बायें नेत्र में एकपादखण्ड और दायें नेत्र
में गान्धार खण्ड तथा वायें कान (के छिद्र) में कैवर्त्त खण्ड और दायें कान
(के छिद्र) में महामेरु खण्ड स्थित हैं। यथास्थान इन नौ खण्डों का ध्यान
करने से योगसाधक को इनका साक्षात्कार करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है ॥ ६ ॥
. अष्टकुल पर्वत
मेरुपर्वतो मेरुदण्ड तिष्ठति कैलासो ब्रह्मकपाटे वसति
हिमालयः पृष्ठे मलयो वामकन्धे मन्दरो दक्षिणकन्धरे
विन्ध्याद्रिर्दक्षिणकर्णे मैनाको वामकर्णे श्रीपर्वतो ललाट
एवमष्टकुलपर्वता अन्य उपपर्वताः सर्वाङ्गुलिषु वसन्ति ॥१०॥
(जिस तरह ब्रह्माण्ड में अष्टकुल पर्वत हैं, उसी तरह हमारे व्यष्टि-पिण्ड में
भी उनका यथास्थान वर्णन किया जाता है।) शरीर में—मेरुदण्ड में सुमेरु पर्वत,
मस्तक में कैलास पर्वत, पीठ में हिमालय पर्वत, बायें कंधे में मलय पर्वत और
दायें कंधे में मन्दराचल, दायें कान में विन्ध्याचल, बायें कान में मैनाक पर्वत,
ललाट में श्रीशैल तथा सभी अँगुलियों में अन्य उपपर्वतों (छोटे-बड़े पहाड़ों)
का ध्यान करने से उनका साक्षात्कार करने में योगसाधक समर्थ होता हैं ॥१०॥
नौ नदी तथा अन्य उपनदियाँ
पोनसा, यमुना, गङ्गा, चन्द्रभागा, सरस्वती, पिपासा,
शतरुद्रा, श्रोरात्रिश्रोनर्मदा एवं नवनद्यो नवनाडोषु वसन्ति ।
अन्य . उपनद्यः कुल्योपकुल्या, द्विसप्तति सहस्त्रनाडीषु
वसन्ति ॥ ११ ॥
१०० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति