सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextसप्त द्वीप तथा सप्त समुद्र
अथ सप्तसमुद्राः सप्तद्वीपाश्च कथ्यन्ते । मज्जाया
जम्बूद्वीपोऽस्थिषु शाकद्वीपः शिरासु सूक्ष्मद्वीपश्चत्वक्षु क्रौञ्च
द्वीपो रोमसु गोमय द्वीपो नखेषु श्वेतद्वीपो मांसे प्लक्षद्वीप एवं
सप्तद्वीपाः ॥ ७ ॥
( जिस तरह ब्रह्माण्ड-शरीर में सात समुद्र तथा सात द्वीप स्थित हैं, उसी
तरह हमारे पिण्ड ( शरीर ) में उनकी यथास्थान स्थिति है । ) सात समुद्रों
और सातों द्वीपों का वर्णन किया जाता है । हमारे व्यष्टि-पिण्ड में मज्जा में
जम्बूद्वीप, हड्डी में शाकद्वीप, प्रवाहिका नाड़ियों में सूक्ष्म द्वीप, त्वचा में क्रौंच द्वीप,
रोमों में गोमय द्वीप, नखों में श्वेत द्वीप और मांस में प्लक्ष द्वीप हैं । ( योगसाधक
को इन सातों का ध्यान करने से शरीर में ही इनके साक्षात्कार और इनमें गति
करने की शक्ति प्राप्त होती है । श्रीमद्भागवत पुराण के पञ्चम स्कन्ध के बीसवें
अध्याय में इन द्वीपों के सम्बन्ध में विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है । ) हमारे
व्यष्टि-पिण्ड में यही सात द्वीपों की भावना है ॥ ७ ॥
मूत्रे क्षारसमुद्रो लालायां क्षीरसमुद्रः कफे दधिसमुद्रो
मेदसि घृतसमुद्रो वसायां मधुसमुद्रो रक्ते इक्षुसमुद्रः शुक्रेऽमृत
समुद्र एवं सप्तसमुद्राः ॥ ८ ॥
( जिस तरह ब्रह्माण्ड में खार ( क्षार ) समुद्र, क्षीर समुद्र, दधि समुद्र,
घृत समुद्र, मधु समुद्र, इक्षु समुद्र और अमृत समुद्र स्थित हैं, उसी तरह हमारे
शरीर के विभिन्न द्रवों में इन सातों समुद्रों की स्थिति निरूपित की जाती है । )
मूत्र में क्षार समुद्र, लार में क्षीर समुद्र, कफ में दधि समुद्र, मेद-मज्जा में घृत समुद्र
चर्बी में मधु समुद्र, रक्त में इक्षु समुद्र और वीर्य-शुक्र में अमृत समुद्र की स्थिति
का ध्यान करने से ( शरीर में ही ) इन सातों समुद्रों का साक्षात्कार करने की
सामर्थ्य योगसाधक को प्राप्त हो जाती है ॥ ८ ॥
नवखण्ड
नवखण्डा नवद्वारेषु वसन्ति । भारतखण्डः कर्परखण्डः
काश्मीरखण्डः श्रीखण्ड शङ्खखण्ड एकपादखण्डो गान्धार
खण्डः कैवर्त्तखण्डो महामेरुखंड एवं नवखण्डाः ॥ ६ ॥
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