Skip to content
SarvaKosh
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

DevanagariHindipublished222 pages

Page 132 of 222

Read in context
Page 132

सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिन्ताविवर्जितः ।
मृतवत् तिष्ठते योगी स मुक्तो नात्र संशयः ॥
( हठयोग प्र० ४ । १०७ )
महायोगी गोरखनाथजी ने विवेकमार्तण्ड में कहा है कि जब जीवात्मा और
परमात्मा का समत्व—ऐक्य स्थापित हो जाता है, तो वही समाधि है। संकल्प
शून्यता की स्थिति प्रत्यक्ष हो जाती है।
यत्समत्वं द्वयोरत्र जीवात्मपरमात्मनोः ।
समस्तनष्टसङ्कल्पः समाधिः सोऽभिधीयते ॥
( विवेकमार्तण्ड १६६ )
निरालम्ब, निराकार, निरामय, निराधार परब्रह्म में—अलखनिरञ्जन
परमेश्वर में योगाभ्यास के फलस्वरूप योगी स्वस्थ हो जाता है। यही अष्टांगयोग
की महती प्रतिष्ठा अथवा सिद्धि है। गीता के छठें अध्याय के दसवें श्लोक से
२६वें श्लोक तक अष्टांगयोग की साधना का ही वर्णन यथाक्रम उपलब्ध होता
है। गीता में वर्णन है कि मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखनेवाला,
आशारहित, संग्रहरहित योगी अकेला ही एकान्त स्थान में स्थित होकर आत्मा
को निरन्तर परमात्मा में लगाये । .... .... अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस
समय परमात्मा में अच्छी तरह स्थित हो जाता है, उस समय सम्पूर्ण भोगों में
स्पृहारहित साधक योगयुक्त हो जाता है ।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्तः आसीत मत्परः ॥
( गीता ६ । ११-१४ )
क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ योगी उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त
बुद्धि के द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ
भी चिन्तन न करे।
६० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary · Page 132 of 222 · SarvaKosh