सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextध्यान के फलस्वरूप उसकी जैविक और मानसिक शक्ति विकसित होती है, उसका
शरीर तेजोमय और कान्तियुक्त हो जाता है ।
अवशिष्टे षोडशे ब्रह्मरन्ध्र आकाशचक्रं तत्र श्रीगुरुचरणा-
म्बुजयुग्मं सदावलोकयेदाकाशवत्पूर्णो भवति । इति षोडशा-
धारः ॥ २५ ॥
शेष सोलहवाँ ब्रह्मरन्ध्र आधार है । यह आकाशचक्र का स्थान है । इसमें
श्रीगुरुके दोनों चरण-कमलों का ध्यान करना चाहिये । इससे साधक आकाश की
तरह पूर्ण रूप से ( निरवच्छिन्न सच्चिदानन्दस्वरूप गुरुतत्व का ध्यान करने
से ) व्यापक—मुक्त हो जाता है ॥ २५ ॥
विशेष—ब्रह्मरन्ध्र आधार में आकाशचक्र ही गुरु-स्वरूप के ध्यान के लिये
उपयुक्त स्थान स्वीकार किया गया है, इस आधार में गुरु के चरण का ध्यान करने
से उनकी प्रसन्नता से परमात्म-ज्योति अभिव्यक्त हो उठती है । इस स्थान में जब
मानसिक और जैविक शक्तियों का उच्च से उच्चतर स्तर की समाधि द्वारा
साधक पूर्ण न्यास ( संस्थापन ) करता है, तब उसे गुरु का प्रसाद ( प्रसन्नता )
प्राप्त होता है । गुरु अपने स्वरूप में सच्चिदानन्दविग्रह है और व्यष्टिरूप में
शिवशक्ति का रूप है । योगसाधक गुरु के प्रसाद से शाश्वत, सनातन, अलख-
निरञ्जन, कैवल्यपद-स्वरूपावस्थित हो जाता है । आकाशचक्र पूर्ण-गिरि-पीठ
है, इसमें साधक परमशून्य परमात्मरूप में तादात्म्य-लाभ कर गुरु के प्रसाद से
साक्षात् शिवस्वरूप हो जाता है । गुरु के चरण-कमल का ध्यान करने से
उसका सदुपदेशामृत सहज प्राप्त होता है ।
भवेद् वीर्यवती विद्या गुरुवक्त्रसमुद्भवा ।
( शिवसंहिता ३ । ११ )
गुरु का स्वरूप नादविन्दु-कलातीत होने पर सम्पूर्ण स्वानन्द-विग्रह होता
है और रूप नादविन्दुकलात्मा होने पर शिवस्वरूप होता है । दोनों स्वरूपों में
पूर्ण तादात्म्य है । गुरु के चरण-कमल का ध्यान ब्रह्मरन्ध्राधार में पूर्ण विहित है,
इससे साधक निरञ्जन पद प्राप्त करता है ।
नमः शिवाय गुरवे नादविन्दुकलात्मने ।
निरञ्जनपदं याति नित्यं यत्र परायणः ।।
( हठयोगप्रदीपिका ४ । १ )
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