सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextइस आधार में दृष्टि की स्थिरता से साधक परम दिव्य ज्योति का दर्शन
करता है।
त्रयोदशं नासाधारं तस्याग्रं लक्षयेन्मनः स्थिरं भवेत् ॥ २२ ॥
तेरहवाँ नासिकाधार है, इसके अग्रभाग में दृष्टि एकाग्र कर ध्यान केन्द्रित
करने से मन स्थिर होता है—अपने चञ्चल स्वभाव को छोड़ कर आत्मस्वरूप में
स्थिर हो जाता है ॥ २२ ॥
विशेष—नासाधार का स्थान नासिका में होता है। नासिका जैविक कार्यों
का महत्वपूर्ण केन्द्र है। योगसाधना की सिद्धि के लिये नासाग्रदृष्टिस्थिरता और
नासाग्रध्यान का योगशास्त्र में विशद विवेचन उपलब्ध होता है। इससे मन की
उद्विग्नता नष्ट हो जाती है और वह गहन समाधि के योग्य हो जाता है।
चतुर्दशं नासामूलक कपाटाधारं तत्र दृष्टिं धारयेत्
षण्मासाज्ज्योतिःपुञ्जं पश्यति ॥ २३ ॥
चौदहवाँ नासामूलक कपाटाधार है, वहाँ दृष्टि स्थिर करनी चाहिये, इससे
छः मास में साधक को (परमात्म) ज्योतिपुञ्ज का दर्शन होता है ॥ २३ ॥
विशेष—कपाटाधार की स्थिति नासामूल में है। यह स्थान भ्रू चक्र—
आज्ञाचक्र के समीप है। इस आधार में दृष्टि और ध्यान को केन्द्रित करने से
सम्पूर्ण मनोमय जगत् प्रकाशित हो उठता है और विज्ञानमय कोष में मन के
विलीन अथवा तल्लीन होने पर परमात्म-ज्योति-पुञ्ज का साधक दर्शन करता
है, यह अन्तर्ज्योति का दर्शन है।
पञ्चदशं ललाटाधारं तत्र ज्योतिःपुञ्जं लक्षयेत् तेजस्वी
भवति ॥ २४ ॥
पन्द्रहवाँ ललाट-आधार है। उसमें ज्योतिः पुञ्ज को लक्ष्य बनाकर उसका
ध्यान करना चाहिये। इस ध्यान से योगी तेजस्वी होता है—दिव्यता को प्राप्त
होता है ॥ २४ ॥
विशेष—ललाटाधार ललाट के मध्य में है। यहाँ स्वतः प्रकाशित ज्योतिः-
पुञ्ज पर ध्यान केन्द्रित करने के लिये साधक को समाधि लगानी होती है। इस
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