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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 276 में से

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पृष्ठ 130

११६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
किमन्यान्यसंस्थं न स्वात्मसंस्थं | चाहिये। क्या यह किसी अन्यमें
ज्ञेयं नानात्मनि बाह्ये। श्रूयते | स्थित है ? नहीं, इसे अपने आत्मामें
च—"तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति | ही स्थित जानना चाहिये, किसी
धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती | बाह्य अनात्मामें नहीं। श्रुति भी
नेतरेषाम्” (क० उ० २।२। | कहती है—"जो बुद्धिमान् आत्मामें
१२) इति। | स्थित उस परब्रह्मको देखते हैं उन्हें
| ही नित्य शान्ति प्राप्त होती है,
| दूसरोंको नहीं।"
तथा च शिवधर्मोत्तरे योगि- | तथा शिवधर्मोत्तरमें भी योगियों-
नामात्मनि स्थितिः— | की आत्मामें ही स्थिति दिखलायी है—
"शिवमात्मनि पश्यन्ति | "योगिजन शिवका आत्मामें ही
प्रतिमासु न योगिनः। | दर्शन करते हैं, प्रतिमाओंमें नहीं।
आत्मस्थं यः परित्यज्य | जो पुरुष आत्मामें स्थित शिवका
बहिःस्थं यजते शिवम्॥ | परित्याग कर बाह्य शिवका पूजन
हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य | करता है वह मानो हाथका ग्रास
लिह्यात्कूर्परमात्मनः । | गिराकर केवल अपनी हथेली चाटता
सर्वत्रावस्थितं शान्तं | है। जिस प्रकार अन्धा आदमी उदय
न पश्यन्तीह शङ्करम्॥ | हुए सूर्यको नहीं देख सकता उसी
ज्ञानचक्षुर्विहीनत्वा- | प्रकार ज्ञाननेत्रोंसे रहित होनेके
दन्धः सूर्यं यथोदितम् । | कारण लोग सर्वत्र विद्यमान शान्त-
यः पश्येत्सर्वगं शान्तं | स्वरूप शिवका दर्शन नहीं कर
तस्याध्यात्मस्थितः शिवः॥ | पाते। जो पुरुष सर्वगत शान्तमूर्ति
आत्मस्थं ये न पश्यन्ति | शिवका दर्शन करता है उसके तो
तीर्थे मार्गन्ति ते शिवम्। | अन्तःकरणमें ही शिव विराजमान
| हैं, किन्तु जो आत्मस्थ शिवको नहीं
| देख सकते वे ही उन्हें तीर्थस्थानमें