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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 495 of 526

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Page 495

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०९

सम्पाद्यते न पूर्वं हि नापरं लभ्यते यतः ॥ ७७ ॥
कृती तत् कुरुते नित्यं यत् समाप्तिं व्रजेत् सुखम् ।

**समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश—**क्योंकि आरम्भ किये हुये कार्य की बिना समाप्ति किये दूसरा कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व का कार्य तो संपन्न नहीं हो पाता और दूसरा भी नहीं हो पाता । अतः बुद्धिमान को चाहिये कि—वह सदा उसी कार्य का प्रारम्भ करे जो सुखपूर्वक समाप्त हो जाय ।

यदि सिद्ध्यति येनार्थः कलहेन वरस्तु सः ॥ ७८ ॥
अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद्-यशोधर्महरः सदा ।

**प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश—**जिस कलह के करने से यदि अपना कोई प्रयोजन सिद्ध होता हो तो वह अच्छा होता है अन्यथा वह (कलह) आयु, धन, मित्र, यश और धर्म का सदा केवल हरनेवाला होता है ।

ईर्ष्या लोभो मदः प्रीतिः क्रोधो भीतिश्च साहसम् ॥ ७६ ॥
प्रवृत्तिच्छिद्रहेतूनि कार्ये सप्त बुधा जगुः ।

**कार्ये में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के कारणों का निर्देश—**ईर्ष्या, लोभ, मद, प्रीति, क्रोध, भय तथा साहस ये ७ कार्य में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के हेतु पण्डितों द्वारा कहे हुये हैं ।

यथाच्छिद्रं भवेत् कार्यं तथैव हि समाचरेत् ॥ ८० ॥
अविसंवादि विद्वद्भिः कालेऽतीतेऽपि चापदि ।

**निर्दोष तथा अभिमत ही कार्य करने का निर्देश—**जिस प्रकार से कार्य निर्दोष हो, उसी प्रकार से करना चाहिये । आपत्ति न रहने पर समय बीत जाने पर भी पण्डितों को जो अभिमत हो उसी कार्य को करना चाहिये ।

दशग्रामी शनानीकः कपरीचारकसंयुतौ ॥ ८१ ॥
अश्वस्थौ विचरेयातां ग्रामपो ह्यपि चाश्वगः ।

**दशग्रामाधिपादिकों का विचरण करने के प्रकारों का निर्देश—**दश ग्रामों का स्वामी और १०० सैनिकों का नायक अपने २ भृत्यों के साथ घोड़े पर सवार होकर विचरण करें । और एक ग्राम के स्वामी भी घोड़े पर सवार होकर विचरण करें ।

साहस्रिकः शतग्रामी एकाश्वरथवाहनौ ॥ ८२ ॥
दशशस्त्रास्त्रिभिर्युक्तौ गच्छेतां वाऽश्वसङ्गतौ ।

१००० हजार सैनिकों के अधिपति और १०० ग्रामों के जो अधिपति हों, वे शस्त्र धारण किये हुये १० सैनिकों से युक्त होकर एक घोड़े जुते हुये रथ पर अथवा केवल घोड़े पर सवार हुये विचरण करें ।