शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 456 of 526
Read in context३७० | शुक्रनीतिः
शीघ्रता के साथ धनुषादि पर चढ़ाना, फिर छोड़ना, फिर ग्रहण करना और फिर छोड़ना ऐसा बार-बार करना, अपने को छिपाना, शस्त्र तथा अस्त्रों का योग्यतानुसार पैंतरा बदलते हुये प्रहार करना, इन सबों को करना चाहिये।
द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिर्वा पङ्क्तितो गमनं ततः।
तथा प्राग् भवनं चापसरणं तूपसर्जनम् ॥ २७५ ॥
**संकेतानुसार गमनादि करने का निर्देश—**कभी दो, तीन या चार की संख्या में पंक्ति बांधकर गमन करना, आगे हो जाना, पीछे हट जाना, यथा-स्थान पर पूर्ववत् स्थित हो जाना इन सबों को संकेतानुसार करे।
अपसृत्यास्त्रासद्ध्यर्थमुपसृत्य विमोक्षणे।
प्राग् भूत्वा मोचयेदस्त्रं व्यूहस्थः सैनिकः सदा ॥ २७६ ॥
**सदा व्यूहबद्ध होकर अस्त्रादि चलाने का निर्देश—**अस्त्र चलाने की सुविधा के लिये पीछे हटकर तथा छोड़ने के लिये समीप जाकर तथा सम्मुख रहकर व्यूहबद्ध सैनिक को सदा अस्त्र चलाना चाहिये।
आसीनः स्याद्विमुक्तास्त्रः प्राग्वा चापसरेत् पुनः।
प्रागासीनं तूपसृतो दृष्ट्वा स्वास्त्रं विमोचयेत् ॥ २७७ ॥
**अस्त्र-प्रयोगादि के समय सैनिकों की स्थिति का निर्देश—**सैनिक अस्त्र छोड़ चुकने के बाद बैठ जावे अथवा आगे की ओर सरक जावे। और आगे बैठे हुये शत्रु को देखकर उसके समीप जाकर अपने अस्त्र का प्रयोग करे।
एकैकशो द्विशो वाऽपि सङ्घशो बोधितो यथा।
क्रौञ्चानां खे गतिर्यादृक् पाङ्क्तः संप्रजायते ॥ २७८ ॥
तादृक् संचारयेत् क्रौञ्चव्यूहं देशबलं यथा।
सूक्ष्मग्रीवं मध्यपुच्छं स्थूलपक्षं तु पङ्क्तितः ॥ २७९ ॥
**क्रौञ्चव्यूह के लक्षण—**संकेत किये जाने पर जैसे आकाश में उड़ने पर क्रौञ्च पक्षियों की पंक्तिबद्ध स्थिति होती है वैसी एक १, दो २ या संघरूप से पंक्तिबद्ध स्थिति में रहने के द्वारा क्रौञ्चव्यूह की रचना देश तथा सैन्य के अनुसार करे। इसमें ग्रीवा भाग पतला, पुच्छभाग मध्यम तथा दोनों पक्षों के भाग मोटे रहते हैं। इसमें ऐसी सैनिकों की पंक्ति स्थिति रहती है।
बृहत्पक्षं मध्यगलपुच्छं श्येनं मुखे तनु।
**श्येनव्यूह के लक्षण—**जिसके दोनों पक्षभाग विशाल हों और गला तथा पुच्छभाग मध्यम हो एवं मुखभाग पतला हो, ऐसी यदि सैनिकों की पंक्ति हो तो उसे 'श्येनव्यूह' कहते हैं।
चतुष्पान्मकरो दीर्घस्थूलवक्त्रद्विरोष्ठकः ॥ २८० ॥
**मकरव्यूह के लक्षण—**जिसके ४ भाग में ४ पैर हों तथा दीर्घ और मोटा