शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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(अध्याय-५), उद्योग-पर्व (अध्याय ३३-३४), शान्ति-पर्व (अध्याय—१-१३०), आश्रम-वासिक-पर्व (अध्याय-५-७) तथा रामायण के अयोध्या काण्ड के १५, ६७ तथा १०० अध्याय भी बहुत ही उपादेय हैं।
नीति-कारों में शुक्राचार्य का स्थान
भारतीय-नीति-शास्त्र के इतिहास में शुक्राचार्य का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। शुक्राचार्य के पर्याय शब्द उशना, काव्य, भार्गव आदि हैं। महाभारत में 'उशना' के रूप में शुक्राचार्य की नीतियों का अनेकषः¹ उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त 'भार्गव,'² 'काव्य'³ आदि शब्द से भी शुक्राचार्य का संकेत किया गया है। शुक्राचार्य के द्वारा किए गए ब्राह्म-नीति-शास्त्र के संक्षिप्त रूप के निर्देश के प्रसंग में महाभारत ने इन्हें 'अमितप्रज्ञ'⁴ 'महायशाः' आदि उपाधियों से विभूषित किया है। अन्यान्य प्राचीन ग्रन्थों में भी⁵ शुक्राचार्य की नीति की अत्यन्त प्रशंसा की गई है। कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र में औशनस-सम्प्रदाय का उल्लेख किया गया है जिसका संकेत पहले किया जा चुका है। विज्ञानेश्वर ने भी औशनस अर्थ-शास्त्र का इस रूप में उल्लेख⁶ किया है जिससे यह प्रतीत होता है कि उनकी दृष्टि में अर्थ-शास्त्रों में औशनस अर्थ-शास्त्र ही मूर्धन्य था। महाभारत⁷ में जब भीष्म की विद्या-प्राप्ति का वर्णन किया गया है तो वहाँ केवल उशना तथा बृहस्पति के नीति-शास्त्रों का ही उल्लेख है और उनमें भी प्राथम्य दिया गया है उशना को। हेमाद्रि के 'चतुर्वर्ग-चिन्तामणि' के 'दानखण्ड'⁸ में उद्धृत एक श्लोक में यह बतलाया गया है कि स्वायम्भुव शास्त्र के चार संस्करण किए गए थे और
१. शा० प० ५६।२९, ३०; ५७।३ आदि।
२. शा० प० ५६।४० आदि।
३. वही ५७।२ आदि।
४. अध्यायानां सहस्रेण काव्यः संक्षेपमब्रवीत्।
तच्छास्त्रममित-प्रज्ञो योगाचार्यो महायशाः ॥ शा० पर्व ५९।८५ ॥
५. इसके विवरण के लिए महामहोपाध्याय काणे महाशय का बम्बई विश्व-विद्यालय के जर्नल—पुस्तक—११, भाग-२, (१९४२) अवलोकनीय है।
६. औशनसाद्यर्थ-शास्त्रस्य—मिताक्षरा—या० स्मृ० २।२१ ॥
७. उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च देव-गुरुर्द्विजः ॥ शान्ति'पर्व ३७।१० ॥
८. भार्गवीया नारदीया बार्हस्पत्याङ्गिरस्यपि।
स्वायम्भुवस्य शास्त्रस्य चतस्रः संहिता मताः ॥
—चतुर्वर्ग-चिन्तामणि—दान-खण्ड—पृ० ५२८ ॥