Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 40 of 526

Read in context
Page 40

( ३८ )

में कुछ ऐसे भी आचार्य हैं जिनका संकेत अत्यल्प है। उदाहरणार्थ हम कौटिल्य के द्वारा उल्लिखित पिशुन, पिशुन-पुत्र, कौणप-दन्त तथा वात-व्याधि को ले सकते हैं। इन आचार्यों का संकेत भी इतना दुर्लभ है कि यह कहना कठिन है कि इन आचार्यों के ग्रन्थ भी कभी थे ! यदि अर्थ-शास्त्र के ऊपर 'नय-चन्द्रिका' व्याख्या लिखने वाले माधवयज्वा (जिसका सम्पादन डा० जौली तथा डा० स्मित ने किया है) के अनुसार पिशुन को नारद का, कौणपदन्त को भीष्म का और वात-व्याधि को उद्धव का पर्याय मान लिया जाय तो कथञ्चित् कुछ समाधान मिल जाता है। इनमें से भीष्म तथा उद्धव की राजनीति महाभारत आदि कुछ ग्रन्थों को छोड़ कर स्वतन्त्र रूप में उनके द्वारा उपनिबद्ध नहीं हुई है। जो कुछ भी हो इतना तो निश्चित है कि किसी भी सूची को पूर्ण नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि अपने से पूर्ववर्त्ती सभी आचार्यों का संग्रह किसी भी सूचीकार ने नहीं किया है।

उपर्युक्त आचार्यों के ग्रन्थों में से अर्थ-शास्त्र या नीति-शास्त्र से स्वतन्त्र रूप में सम्बद्ध केवल तीन ग्रन्थ—कौटिल्य-अर्थ-शास्त्र, शुक्र-नीति-सार तथा चाणक्य-सूत्र—अथवा डा० एफ० डब्ल्यू० थॉमस द्वारा सम्पादित बार्हस्पत्य-सूत्र को लेकर चार ग्रन्थ उपलब्ध हैं। विद्वानों का मत है कि इस बार्हस्पत्य-सूत्र का मूल रूप यद्यपि प्राचीनतम है तथापि वर्त्तमान रूप नवम या दशम शतक का है। शुक्र-नीति-सार का भी साक्षात्-सम्बन्ध शुक्राचार्य से सिद्ध करना कुछ कठिन है।

इन ग्रन्थों के अतिरिक्त आचार्य कामन्दक का 'नीति-सार' (जिसका प्रथम-संघटन ४०० ई० के आस-पास हुआ था और द्वितीय-संघटन १७ वीं शताब्दी में माना जाता है), वैशम्पायन के द्वारा निर्मित 'नीति-प्रकाशिका', भोज का 'युक्ति-कल्पतरु' सोमदेव (९५९ ई०) का 'नीति-वाक्यामृत'; लक्ष्मीधर के 'कृत्य-कल्पतरु' का 'राजनीति-काण्ड', चण्डेश्वर का 'राजनीति-रत्नाकर', मित्र-मिश्र का 'राजनीति-प्रकाश', नीलकण्ठ का 'नीति-मयूख' अथवा 'राज-नीति-मयूख' अनन्तदेव का 'राज-धर्म-कौस्तुभ' आदि राज-नीति-शास्त्र के प्रमुख ग्रन्थ हैं। पुराणों में भी अग्नि-पुराण (अध्याय—२१८-२४२), गरुड़-पुराण (अध्याय—१०८-११५), मत्स्य-पुराण (अध्याय—२१५-२४३), मार्कण्डेय-पुराण (अध्याय—२४), कालिका-पुराण (अध्याय—८७) आदि विशेषतः अवलोकनीय हैं। स्मृतियों में मनुस्मृति (सप्तम से नवम अध्याय तक), बृहत्पाराशर-स्मृति (अध्याय—१०) वृद्ध-हारित-स्मृति (अध्याय—७) आदि द्रष्टव्य हैं। महाभारत के वनपर्व (अध्याय—१५०), सभापर्व