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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 389 of 526

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Page 389

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०३

तस्मान्न लेख्यसामर्थ्यात् सिद्धिरैकान्तिकी मता ।
**ठगों और कुटिलोँ द्वारा बनावटी लेख कर लेने का निर्देश—**निपुण जालसाज लोग सदा किसी लिखावट का तदनुरूप नकल कर लेते हैं। इसलिये केवल लेख के आधार पर फैसला करना पूर्णरूप से उचित नहीं माना गया है।

स्नेहलोभभयक्रोधैः कूटसाक्षित्वशङ्कया ॥ २१२ ॥
केवलैः साक्षिभिर्नैव कार्यं सिध्यति सर्वदा ।
**केवल साक्षियों से ही कार्यसिद्धि के न करने का निर्देश—**स्नेह, लोभ, भय, अथवा क्रोधवश होकर भी मनुष्य झूठी साक्षी दे सकता है, इस शंका से केवल साक्षी के आधार पर भी सदा अभियोग का उचित निर्णय नहीं हो सकता है।

अस्वामिकं स्वामिकं वा भुङ्क्ते यद् बलदर्पतः ॥ २१३ ॥
इति शङ्कितभोगेन कार्यं सिध्यति केवलैः ।
**केवल भोगों से ही कार्यसिद्धि न होने का निर्देश—**अपने बल के घमण्ड में आकर भी मनुष्य चाहे अपनी वस्तु हो या दूसरे की किन्तु उसपर जबर-दस्ती कब्जा कर सकता है। इस लिये भोग (कब्जा) के विषय में भी सन्देह होने से केवल उसी के आधार पर ही फैसला नहीं किया जा सकता है।

शङ्कितव्यवहारेषु शङ्क्येदन्यथा नहि ॥ २१४ ॥
अन्यथा शङ्कितान् सभ्यान् दण्डयेच्चौरवन्नृपः ।
**अनुचित शंका उपस्थित करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**जिन व्यवहारों (मुकदमों) में उचित शंका हो चुकी है उनमें पुनः विपरीत शङ्का नहीं उपस्थित करनी चाहिये। यदि कोई सभा (जूरी आदि) विपरीत शङ्का उपस्थित करे तो राजा उसे चोर के समान दण्ड दे।

अन्यथा शङ्कनान्नित्यमनवस्था प्रजायते ॥ २१५ ॥
लोको विभिद्यते धर्मो ह्यव्यवहारश्च हीयते ।
**विपरीत शङ्का करने से अनवस्था होने का निर्देश—**विपरीत शङ्का करने से व्यवहार में अनवस्था उत्पन्न होने से जल्दी निर्णय न हो सकेगा। और लोकधर्म बिगड़ जावेगा तथा व्यवहार का क्रम भी टूट जायगा।

सागमो दीर्घकालश्च निराक्रोशो निरन्तरः ॥ २१६ ॥
प्रत्यर्थिसन्निधानश्च भुक्तो भोगः प्रमाणवत् ।
**प्रामाणिक भोग के लक्षण—**आगम (लेख) के सहित, और दीर्घकाल का भोग (कब्जा) प्रामाणिक होता है और यदि स्वामी का अपनी वस्तु से विच्छेद हो गया हो या उसने एकदम से उसे छोड़ दिया हो और प्रतिवादी उसके समीप ही रहता हो तो वहां पर कब्जा प्रामाणिक माना जाता है।