शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context३०२ | शुक्रनीतिः
पाप करनेवाला व्यक्ति यह समझता है कि कोई पाप करते हुये मुझको नहीं देख रहा है किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि उसे देवता लोग एवं उसके अन्तर्रात्मा देखते रहते हैं।
सुकृतं यत्त्वया किञ्चिज्जन्मान्तरशतैः कृतम् ।
तत्सर्वं तस्य जानीहि यं पराजयसे । मृषा ॥ २०६ ॥
समाप्नोषि च तत्पापं शतजन्मकृतं सदा ।
सैकड़ों जन्मों में तपस्या करके तुमने जिन पुण्यों का उपार्जन किया है वे उस व्यक्ति को प्राप्त हो जावेंगे, जिसको तुम झूठ बोलकर पराजित कर दोगे और उस पराजित पुरुष के सैकड़ों जन्मों के सभी पापों को प्राप्त करोगे इसे जान लो।
साक्षिणं श्रावयेदेवं सभायामरहोगतम् ॥ २०७ ॥
दद्याद्देशानुरूपं तु कालं साधनदर्शने ।
उपाधिं वा समीक्ष्यैव दैवराजकृतं सदा ॥ २०८ ॥
इस प्रकार से सभा में सबके समक्ष साक्षी को अवश्य सुना देवे। और साधन (प्रमाण) दिखाने के लिये जो समय दे वह देश के अनुरूप होना चाहिये। अथवा दैव तथा राजा के द्वारा की हुई दुर्घटना का भी सदा विचार रखकर समय दे।
विनष्टे लिखिते राजा साक्षिभोगैर्विचारयेत् ।
लिखित के नष्ट हो जाने पर साक्षी एवं भोग (कब्जा) के आधार पर विचार करे।
लेखसाक्षिबिनाशे तु सद्भोगादेव चिन्तयेत् ॥ २०९ ॥
लेख और साक्षी न मिलने पर भोग से ही विचार करने का निर्देश—
और जहां पर लेख तथा साक्षी दोनों नष्ट हो गये हों वहां पर सज्जनकृत भोग (कब्जा) देखकर ही विचार करे।
सद्भोगाभावतः साक्षिलेखतो विमृशेत् सदा ।
और जहां पर सज्जनकृत कब्जा नहीं है वहां पर साक्षी तथा लेख के द्वारा सदा विचार करना चाहिये।
केवलेन च भोगेन लेखेनापि च साक्षिभिः ॥ २१० ॥
कार्यं न चिन्तयेद्राजा लोकदेशादिधर्मतः ।
राजा लोक तथा देश आदि के धर्म का विचार कर केवल भोग (कब्जा), लेख या साक्षी के आधार पर ही मुकदमे का फैसला न कर देवे। बल्कि यथासंभव सभी के आधार पर विचार करे।
कुशला लेख्यबिम्बानि कुर्वन्ति कुटिलाः सदा ॥ २११ ॥