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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 379 of 526

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Page 379

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २९३

प्राङ्न्याय के लक्षण— इस तरह का इनका हमारा विवाद, पहले हो चुका है जिसमें हमारी जीत हो चुकी है ऐसा यदि प्रतिवादी कहे तो उस उत्तर का नाम 'पूर्वन्यायविधि' अथवा 'प्राङ्न्याय' कहलाता है ।

जयपत्रेण सभ्यैर्वा साक्षिभिर्भावयाम्यहम् ।
मया जितः पूर्वमिति प्राङ्न्यायस्त्रिविधः स्मृतः ॥ १५० ॥

प्राङ्न्याय के ३ प्रकार— १. जयपत्र (डिक्री), २. जूरियों ३. या साक्षियों के द्वारा 'मेरी डिक्री हो चुकी है' इस बात को सिद्ध कर रहा हूँ' ऐसे उत्तर वाले 'प्राङ्न्याय' के उक्त प्रकार से तीन भेद होते हैं ।

अन्योऽन्ययोः समक्षं तु वादिनोः पक्षमुत्तरम् ।
न हि गृह्णन्ति ये सभ्या दण्ड्यास्ते चौरवत् सदा ॥ १५१ ॥

परस्पर एक दूसरे के समक्ष ही वादी प्रतिवादी के क्रमशः पक्ष और उत्तर को जो सुनकर तदनुरूप नहीं लिख लेते हैं या नहीं स्वीकार करते हैं वे चोर की भांति सदा दण्ड पाने योग्य होते हैं ।

लिखिते शोधिते सम्यक् सति निर्दोष उत्तरे ।
अर्थिप्रत्यर्थिनोर्वापि क्रिया कारणमिष्यते ॥ १५२ ॥

लिखे हुये उत्तर के भलीभांति शोधित हो जाने पर जब दोषरहित हो जाय तब वादी-प्रतिवादी की क्रिया अर्थात् साक्षी का लेखपत्र, आदि का प्रमाण दिखाना आदि ही जयपत्र (डिग्री) का कारण होता है ।

पूर्वपक्षः स्मृतः पादो द्वितीयश्चोत्तरात्मकः ।
क्रियापादस्तृतीयस्तु चतुर्थो, निर्णयाभिधः ॥ १५३ ॥

व्यवहार के ४ पाद— इस प्रकार से व्यवहार (मुकदमे) के ४ पाद होते हैं जिसमें १- पूर्व पक्ष, २- उत्तर ३- क्रिया ४- निर्णय ये क्रमसे हैं ।

कार्यं हि साध्यमित्युक्तं साधनं तु क्रियोच्यते ।
अर्थी तृतीयपादे तु क्रियया प्रतिपादयेत् ॥ १५४ ॥

कार्य को 'साध्य' और साधन को 'क्रिया' कहते हैं, अतः अर्थी (वादी) व्यवहार के तृतीय पाद क्रिया (तहकीकात) होने पर प्रमाणों (साधनों) को जज के समक्ष उपस्थित करे ।

चतुष्पाद् व्यवहारः स्यात् प्रतिपत्त्युत्तरं विना ।

प्रतिपत्त-संज्ञक (सत्य) उत्तर में अर्थात् जहां पर प्रतिवादी वादी के पक्ष को स्वीकार कर लेता है वहां पर व्यवहार (मुकदमा) दो ही पाद का माना जाता है शेष में ४ पाद का होता ही है ।

क्रमागतान् विवादांस्तु पश्येद्वा कार्यगौरवात् ॥ १५५ ॥

प्रथम निर्णय के योग्य न्याय या विवाद का निर्देश— राजा विवादों