शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| २६२ | शुक्रनीतिः |
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वे तो प्रतिवादी पर डिग्री कर देना चाहिये और सामादि उपायों से वादी को रुपया दिला देना चाहिये ।
मोहाद्वा यदि वा शाठ्याद् यन्नोक्तं पूर्ववादिना ।
उत्तरान्तर्गतं वा तत्प्रश्नैर्ग्राह्यं द्वयोरपि ॥ १४३ ॥
मोहवश या शठतावश पहले वादी ने जो नहीं भी कहा है और प्रतिवादी ने उत्तर देते समय जिसे न कहा हो उसे जज प्रश्न करके साफ कर ले ।
सत्यं मिथ्योत्तरं चैव प्रत्यवस्कन्दनं तथा ।
पूर्वन्यायविधिश्चैवमुत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ १४४ ॥
४ प्रकार के उत्तर—१. सत्य उत्तर २. मिथ्या उत्तर, ३. प्रत्यवस्कन्दन, ४. पूर्वन्यायविधि इस भांति से उत्तर ४ प्रकार का होता है ।
अङ्गीकृतं यथार्थं यद् वाद्युक्तं प्रतिवादिना ।
सत्योत्तरं तु तज्ज्ञेयं प्रतिपत्तिश्च सा स्मृता ॥ १४५ ॥
सत्योत्तर के लक्षण—वादी ने जो कुछ कहा है वह ठीक है ऐसा प्रतिवादी के स्वीकार करने पर जो उत्तर है वह 'सत्य' उत्तर कहा जाता है, उसको 'प्रतिपत्ति' भी कहते हैं ।
श्रुत्वा भाषार्थमन्यस्तु यदि तं प्रतिषेधति ।
अर्थतः शब्दतो वापि मिथ्या तज्ज्ञेयमुत्तरम् ॥ १४६ ॥
मिथ्योत्तर के लक्षण—वादी के भाषार्थ ( प्रार्थना पत्र ) को सुनकर यदि प्रतिवादी उसको नहीं स्वीकार करता है अर्थात् निषेध करता है तो उसे 'मिथ्या' उत्तर कहते हैं । चाहे वह शब्द या अर्थ को लेकर हो ।
मिथ्यैतन्नाभिजानामि तदाऽतत्र न सन्निधिः ।
अजातश्चास्मि तत्काले इति मिथ्या चतुर्विधम् ॥ १४७ ॥
मिथ्योत्तर के ४ प्रकार—१. यह मिथ्या है, २. इसे मैं नहीं जानता हूँ, ३. उस समय मैं वहां उपस्थित नहीं था, और ४. मैं तो तब उत्पन्न भी नहीं हुआ था । इस प्रकार से 'मिथ्या उत्तर' चार प्रकार का होता है ।
अर्थिना लिखितो ह्यर्थः प्रत्यर्थी यदि तं तथा ।
प्रपद्य कारणं ब्रूयात् प्रत्यवस्कन्दनं हि तत् ॥ १४८ ॥
प्रत्यवस्कन्दन के लक्षण—अर्थी ( वादी ) ने जो दावा में लिखा है उसको यदि प्रत्यर्थी ( प्रतिवादी ) स्वीकार करके भी उस दोष के करने में कारण को कहे तो वह 'प्रत्यवस्कन्दन' उत्तर कहलाता है । इसको बात मान कर पुनः उसे काटना कहते हैं ।
अस्मिन्नर्थे ममानेन वादः पूर्वमभूत्तदा ।
जितोऽहमिति चेद् ब्रूयात् प्राङ्न्यायः स उदाहृतः ॥ १४९ ॥