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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 33 of 526

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साधारणतः यही प्रतीत होता है कि कृत-युग में राजा की कोई आवश्यकता न थी। इसी प्रकार का मत कई ग्रन्थों में पाया जाता है।

परन्तु आधुनिक विचारक—जिनकी दृष्टि में कृत-युग, त्रेता आदि का कोई महत्त्व नहीं है—इस मत को मानने में पूर्णतः सपक्ष नहीं हो सकते। इन लोगों की दृष्टि में राजा भी एक मनुष्य ही होता है और मानव-जाति की उत्पत्ति के साथ-साथ ही राजा की भी एक मानव के रूप में उत्पत्ति हुई है यद्यपि उसके राज्य-पद पर नियोजन के प्रकार समय-समय पर परिवर्तित होते रहे हैं। न्याय्य तथा अन्याय्य आचरण की अवधि कुछ निश्चित नहीं हो सकती है, जिसे कृत-युग या कलि-युग कहा जा सके। देश-काल आदि के अनुसार कभी न्याय्य आचरण का प्राधान्य हो सकता है और कभी अन्याय्य आचरण का। इस लिए यह कहना उचित नहीं है कि कृत-युग की कोई निश्चित अवधि रही और उसमें किसी राजा की आवश्यकता थी ही नहीं, अपितु यही मानना उचित है कि सब दिन लोगों में अत्यधिक रूप में अशान्ति रही और उसके प्रतीकार के लिए एक व्यवस्थापक या शासक की भी स्थिति अवश्य ही, अधिकार-तारतम्य के साथ-साथ, रही होगी।

इस प्रसङ्ग में यह विचारणीय है कि इस आधुनिक मत का समर्थन हमारे प्राचीन ग्रन्थों से भी होता है। जिन महा-भारत या मनुस्मृति आदि ग्रन्थों को पूर्वोक्त प्रथम-पक्ष का समर्थक बतलाया गया है उन्हीं से यह आधुनिक मत भी सिद्ध होता है। हमें तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इन ग्रन्थों के पूर्वोक्त मत का भी वस्तुतः तात्पर्य यही है जो आधुनिक मत का तात्पर्य है। महाभारत में युधिष्ठिर के प्रति भीष्म का कथन है कि सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलि-युग का अर्थ है 'दण्ड' के प्रयोग में राजा के अवधान का आधिक्य और अल्पत्व'। इससे यही सार निकलता है कि राजा की कुशलता तथा


१. दण्ड-नीत्यां यदा राजा सम्यक्कात्स्न्र्येन वर्त्तते ।
तदा कृत-युगं नाम कालसृष्टं प्रवर्त्तते ॥
दण्ड-नीत्यां यदा राजा त्रीनंशाननुवर्त्तते ।
चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवर्त्तते ॥
अर्धं त्यक्त्वा यदा राजा नीत्यर्धमनुवर्त्तते ।
ततस्तु द्वापरं नाम स कालः सम्प्रवर्त्तते ॥
दण्ड-नीतिं परित्यज्य यदा कात्स्न्र्येन भूमिपः ।
प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्त्तेत तदा कलिः ॥