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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 32 of 526

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Page 32

( ३० )

लिए यह भी कहा गया है कि राजा के अभाव में प्रजा की¹ रक्षा नहीं हो सकती है। सारांश यही है कि जब अनाचार या अधर्म का संचार हुआ तभी राजा की आवश्यकता हुई। अतः विचारणीय यही है कि अनाचार का संचार कब हुआ।

युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर देते हुए महाभारत में भीष्म ने² कहा है कि कृत-युग में धर्म के ही प्रसार से अधर्म-निरोधक दण्ड या दण्ड-धर राजा की स्थिति थी ही नहीं, पर जब लोगों में अनाचार का संचार हुआ तब देवताओं की प्रार्थना से ब्रह्मा तथा विष्णु के द्वारा क्रमशः दण्ड-प्रकार आदि के उपदेश के लिए नीति-शास्त्र तथा राजा का आविष्कार किया गया। मनुस्मृति में किए गए कृत-युग³ के वर्णन तथा राजा की सृष्टि⁴ की एकवाक्यता से भी


यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्डेष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥ म० स्मृ० ७।२० ॥
१. रक्षार्थमस्य लोकस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ म० स्मृ० ७।२ ॥
यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजाः ।
अकर्ण-धारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ शु० नी० सा० १।६५ ॥
२. नियतस्त्वं नर-व्याघ्र शृणु सर्वानशेषतः ।
यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृत-युगेऽभवत् ॥ शा० प० ५९।१३ ॥
न वै राज्यं न राजाऽसीत् न दण्डो न च दाण्डिकः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ शा० प० ५९।१४ ॥
ते मोह-वशमापन्ना मनुजा भरतर्षभ ॥ शा० प० ५९।१६ ॥

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नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् ।
ते त्रस्ता नर-शार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ शा० प० ५९।२२ ॥

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ततोऽध्यायः सहस्राणां शतं चक्रे स्व-बुद्धिजम् ॥ शा० प० ५९।२९ ॥

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अथ देवाः समागम्य विष्णुमूचुः प्रजापतिम् ।
एको योऽर्हति मर्त्येभ्यः श्रैष्ठ्यं वै तं समादिश ॥ शा० प० ५९।८७ ॥
ततः सञ्चिन्त्य भगवान् देवो नारायणः प्रभुः ।
तैजसं वै विरजसं सोऽसृजद् मानसं सुतम् ॥ शा० प० ५९।८८ ॥
३. चतुष्पात् सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे ।
नाधर्मेणागमः कश्चिन्मनुष्यान् प्रति वर्तते ॥ म० स्मृ० १।८१ ॥
४. म० स्मृ० ७।३ ॥