शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४१
भूमि पर शयन करे, प्रमाद से रहित होकर इस प्रकार से तीन दिन तक व्यतीत करे।
स्नायीत सा त्रिरात्र्यन्ते सचैलाभ्युदिते रवौ ॥ २५ ॥
रजस्वला स्त्री की शुद्धि के समय का निर्देश—इसके बाद तीन रात्रि व्यतीत होने के बाद वह सूर्य के उदय होने पर सारे वस्त्रों के सहित स्नान करे।
विलोक्य भर्तृवदनं शुद्धा भवति धर्मतः ।
कृतशौचा पुनः कर्म पूर्ववच्च समाचरेत् ॥ २६ ॥
उसके बाद पति का मुख देखकर धर्म करने के योग्य शुद्ध हो जाती है । फिर शुद्ध हुई वह पूर्ववत् पुनः कर्म करना प्रारम्भ करे ।
द्विजस्त्रीणामयं धर्मः प्रायोऽन्यासामपीष्यते ।
कृषिपण्यादिपुंकृत्यै भवेयुस्ताः प्रसाधिकाः ॥ २७ ॥
यह द्विजाति ( ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य ) की स्त्रियों के लिये धर्म है किन्तु प्रायः अन्य जाति की स्त्रियों के लिये भी उचित है । वे शूद्रजाति की स्त्रियां कृषि तथा वस्तु बेचना आदि पुरुष के कृत्यों में साथ २ कार्य करनेवाली होती हैं, अतः वे नहीं भी इस धर्मं का पालन कर पाती हैं ।
सङ्गीतैर्मधुराऽऽलापैः स्वायत्तस्तु पतिर्यथा ।
भवेत्तथाऽऽचरेयुर्वै मायाभिः कामकेलिभिः ॥ २८ ॥
पतिव्रता स्त्रियों के कर्त्तव्यों का निर्देश—पति जिस प्रकार से अपने अधीन हो सके उसी प्रकार से गाना-बजाना, मधुर बातचीत, मोहित करनेवाली कामक्रीडा इत्यादि का आचरण करना स्त्रियों को उचित है ।
मृते भर्तरि सङ्गच्छेद् भर्तुर्वा पालयेद् व्रतम् ।
परवेश्मरुचिर्न स्याद् ब्रह्मचर्ये स्थिता सती ॥ २९ ॥
पति के मरने पर साथ सती हो जाये अथवा वैधव्य व्रत का पालन करती हुई पतिव्रत और गार्हस्थ्य कर्म का पालन करे । उस समय दूसरे के घर में जाने या रहने की रुचि न करे, और ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित रहे ।
भोजनं वर्जयेन्नित्यं तथा• प्रोषितभर्तृका ।
देवताराधनपरा तिष्ठेद् भर्तृहिते रता ॥ ३० ॥
धारयेन्मङ्गलार्थानि किञ्चिदाभरणानि च ।
तथा प्रोषितभर्तृका ( जिसका स्वामी परदेश चला गया हो वह ) स्त्री शरीर को आभूषणादि से मण्डित करना त्याग देवे । पति के हित में लीन रहकर देवता की आराधना में तत्पर रहे । और केवल मङ्गल ( सधवा ) सूचक चूड़ी-नथ आदि थोड़े आभूषणों को धारण करे ।
नास्ति भर्तृसमो नाथो नास्ति भर्तृसमं सुखम् ॥ ३१ ॥
१६ शु०