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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 326 of 526

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Page 326
२४०शुक्रनीतिः

नोच्चैर्वदेन्न परुषं न बह्वाहूतिमप्रियम् ।
न केनचिच्च विवदे-दप्रलापविवादिनी ॥ १९ ॥
न चास्य व्ययशीला स्यान्न धर्म्मार्थविरोधिनी ।

पति के सो जाने पर स्वयं भी पति में मनको लगाते हुये उसकी शय्या पर सो जावे। और स्त्री कभी नग्न न रहे, असावधानी न करे, किसी वस्तु की कामना न प्रगट करे, इन्द्रियों को अपने वश में रक्खे, उच्चस्वर से बात-चीत न करे, न कठोर स्वर से बोले, और न किसी को बहुत पुकारे, न अप्रिय वचन कहे, न किसी के साथ विवाद करे, और यदि विवाद करना ही पड़े तो विवाद के समय निरर्थक वचन न बोले, और पति का अधिक धनव्यय कराने-वाली एवं धर्म तथा अर्थ सम्बन्धी कार्यों का विरोध करनेवाली भी न होवे ।

प्रमादोन्मादरोषेर्ष्या-वचनान्यतिनिन्दिताम् ॥ २० ॥
पैशुन्यहिंसाविषय-मोहाहंकारदर्पताम् ।
नास्तिक्यसाहसस्तेय-दम्भान् साध्वी विवर्जयेत् ॥ २१ ॥

**साध्वी स्त्रियों को पैशुन्यादि-त्याग का निर्देश—**और साध्वी स्त्री असाव-धानता, उन्मत्तता, क्रोध तथा ईर्ष्या को प्रगट करनेवाले वचनों को एवं अति-निन्दित चुगलखोरी, हिंसा, विषयों के प्रति मोह, अहङ्कार, अपनी श्रेष्ठता, नास्तिकता, सहसा कार्य कर बैठना, चोरी, दम्भ इन सबों को छोड़ देवे।

एवं परिचरन्ती सा पतिं परमदैवतम् ।
यशस्यमिह यात्येव परत्रैषा सलोकताम् ॥ २२ ॥

**यथोक्त पति सेवा से पतिलोक जाने का निर्देश—**इस प्रकार से पति को ही परम देवता मानकर परिचर्या करती हुई वह स्त्री इस लोक में सुन्दर यश तथा परलोक में पतिलोक को प्राप्त करती है।

योषितो नित्यकर्मोक्तं नैमित्तिकमथोच्यते ।
रजसो दर्शनादेषा सर्व्वमेव परित्यजेत् ॥ २३ ॥

**स्त्रियों के नैमित्तिक कृत्यों का निर्देश—**इस भांति से स्त्रियों के नित्य कर्मों का वर्णन किया गया, अब नैमित्तिक कर्मों का वर्णन कर रहे हैं। वह स्त्री रजोदर्शन के दिन से उक्त सभी नित्य कर्मों का परित्याग कर देवे।

सर्व्वैरलक्षिता शीघ्रं लज्जिताऽन्तर्गृहे वसेत् ।
एकाम्बरा कृशा दीना स्नानालङ्कारवर्जिता ॥ २४ ॥

और सबसे अलक्षित होकर लजाई हुई गृह के अन्दर निवास करे। उस समय एक वस्त्र धारण करके कृश तथा दीन के समान स्नान तथा अलङ्कार से हीन होकर रहे।

स्वपेद् भूमावप्रमत्ता क्षपेदेवमहस्त्रयम् ।