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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 324 of 526

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Page 324
२३८शुक्रनीतिः

नीच कुल के भाव को एवं नीच कुलवाले उच्च कुल के भाव को धारण करने लगते हैं अर्थात् सब स्वेच्छाचारी हो जाते हैं ।

देवपूजां नैव कुर्यात् स्त्री शूद्रस्तु पतिं विना ।
जपस्तपस्तीर्थसेवा-प्रव्रज्या-मन्त्रसाधनम् ॥ ५ ॥

स्त्री और शूद्र को देवपूजादि न करने का निर्देश— स्त्री तथा शूद्र को क्रम से पति तथा स्वामी की सेवा छोड़ कर जप, तप, तीर्थ-सेवन, संन्यास, मन्त्र की साधना और देवता की पूजा नहीं ही करनी चाहिये ।

न विद्यते पृथक् स्त्रीणां त्रिवर्गविधिसाधनम् ।

स्त्रियों के लिये पतिसेवा से अन्य धर्म का निषेध— स्त्रियों के लिये पति की सेवा को छोड़कर अन्य कोई धर्म, अर्थ तथा काम की सिद्धि के लिये साधन नहीं है ।

पत्युः पूर्वं समुत्थाय देहशुद्धिं विधाय च ॥ ६ ॥
उत्थाप्य शयनीयानि कृत्वा वेश्मविशोधनम् ।
मार्जनैर्लेपनैः प्राप्य सानलं यवसाङ्गणम् ॥ ७ ।
शोधयेद्यज्ञपात्राणि स्निग्धान्युष्णेन वारिणा ।
प्रोक्षणीयानि तान्येव यथास्थानं प्रकल्पयेत् ॥ ८ ॥
शोधयित्वा तु पात्राणि पूरयित्वा तु धारयेत् ।

स्त्रियों के नित्य कृत्यों का निर्देश— स्त्री प्रतिदिन पति से पूर्व शय्या से उठकर शरीर-शुद्धि ( मुख-प्रक्षालनादि ) करके और बिछी हुई शय्या को उठाकर रखने के बाद झाडू से बुहार कर तथा लीपकर गृह की सफाई करे। उसके बाद अग्नियुक्त तथा घास पड़े हुये आंगन में पहुँच कर वहां की सफाई करे। और घृत से चिकने यज्ञपात्रों को गर्म जल से धोकर पोछकर पुनः उन्हें अपने २ स्थानों पर रख दे। और उन्हें रखने के पूर्व खूब सुखाकर ( जिससे जल का अंश न रहने पावे ) पुनः घृतादि से पूर्ण करके यथास्थान रख देवे ।

महानसस्थ-पात्राणि बहिः प्रक्षाल्य सर्वशः ॥ ९ ॥
मृद्भिस्तु शोधयेच्चुल्लीं तत्राग्निं सेन्धनं न्यसेत् ।
स्मृत्वा नियोगपात्राणि रसान्नान्नद्रविणानि च ॥ १० ॥
कृतपूर्वाह्णकार्य्यं श्वशुरावभिवादयेत् ।

उसके बाद रसोईगृह के पात्रों को बाहर निकालकर चारो तरफ से खूब मांज-धोकर मिट्टी से चुल्ली तथा रसोई घर लीपकर वहां पर अग्नि तथा लकड़ी रख देवे और उस दिन कार्य में आनेवाले पात्रों एवं लवणादि रस, अन्न तथा धन का ख्याल करके उसकी व्यवस्था करती रहे। पश्चात् पूर्वाह्ण

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