Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 323 of 526

Read in context
Page 323

चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २३७

में शीघ्रता करना और देने में विलम्ब करना ये दोनों यद्यपि गुण हैं तथापि पृथक् २ ही कलायें मानी गई हैं ।

चतुःषष्टिकला ह्येताः संक्षेपेण निदर्शिताः ।
यां यां कलां समाश्रित्य तां तां कुर्यात्स एव हि ॥ १०१ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य राष्ट्रे आद्यं विद्याकलानिरूपणं नाम तृतीयं प्रकरणम् ।

संक्षेप से ये ६४ कलायें कही गईं । इनमें से जिस २ कला का जो मनुष्य आश्रय लेकर उसमें निपुण बनता है । सर्वथा निपुणता के साथ करने के लिये उसी २ कला को सदा उसे करते रहना चाहिये ।

इस प्रकार शुक्रनीति की भाषाटीका के चतुर्थाध्याय में आद्य विद्याकला-निरूपण-नाम तृतीय प्रकरण समाप्त ।


चतुर्थाध्यायस्य लोकधर्म-निरूपणं नाम चतुर्थं प्रकरणम् ।

ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिः क्रमात् ।
चत्वार आश्रमाश्चैते ब्राह्मणस्य सदैव हि ॥ १ ॥
अन्येषामन्त्यहीनाश्च क्षत्रविट्शूद्रकर्मणाम् ।

४ आश्रमों का नाम निर्देश— ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी इन चारों के क्रम से ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास ये ४ आश्रम सदा ब्राह्मणों के ही होते हैं । इनमें से आखिरी संन्यास को छोड़कर शेष ३ आश्रम ब्राह्मण से अन्य क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों के होते हैं ।

विद्यार्थी ब्रह्मचारी स्यात् सर्वेषां पालने गृही ॥ २ ॥
वानप्रस्थः सन्दमने संन्यासी मोक्षसाधने ।

४ आश्रमों में कृत्यों का निर्देश— विद्या पढ़ने के लिये ब्रह्मचारी, सभी आश्रमों के पालनार्थ गृही ( गृहस्थ ), इन्द्रियों के दमनार्थ वानप्रस्थ, मोक्ष-साधनार्थ संन्यासी बनना उचित होता है ।

वर्तयन्त्यन्यथा दण्ड्या या वर्णाश्रमजातयः ॥ ३ ॥

जो वर्ण आश्रम तथा जाति के लोग अपने २ धर्म के विरुद्ध आचरण करते हैं वे राजा के द्वारा दण्डनीय होते हैं ।

यदि राज्ञोपेक्षितानि दण्डतोऽशिक्षितानि च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति ह्यकुलानि कुलीनताम् ॥ ४ ॥

यदि राजा उपेक्षा कर देवे और दण्ड द्वारा शिक्षा न देवे तो उच्च कुलवालेः