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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 258 of 526

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Page 258

१७२ | शुक्रनीतिः

कृषिस्तु चोत्तमा वृत्तिर्या सरिन्मातृका मता ॥ २७६ ॥
मध्यमा वैश्यवृत्तिश्च शूद्रवृत्तिस्तु चाधमा ।
कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता— नदी से सींची जानेवाली कृषि (खेती) उत्तम आजीविका है। वैश्यवृत्ति (व्यवसाय-गोरक्षा आदि) मध्यम आजीविका है। शूद्रवृत्ति (सेवा) अधम आजीविका है।

याच्ञाऽधमतरा वृत्तिर्ह्युत्तमा सा तपस्विषु ॥ २७० ॥
क्वचित्सेवोत्तमा वृत्तिर्धर्मशीलन्नृपस्य च ।
भिक्षा की अधमता तथा क्वचित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तिता— भिक्षावृत्ति अत्यन्त अधम आजीविका है किन्तु वही तपस्वियों के लिये उत्तम है। कहीं पर धर्मशील राजा की सेवा भी उत्तम आजीविका मानी जाती है।

आध्वर्यवादिकं कर्म कृत्वा या गृह्यते भृतिः ॥ २७८ ॥
सा किं महाधनायैव वाणिज्यमल्पमेव किम् ।
आध्वर्यवादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देश— यजुर्वेदोक्त अध्वर्यु-सम्बन्धी कर्म करके जो दक्षिणास्वरूप में वेतन लिया जाता है क्या वह महाधन की प्राप्ति के लिये पर्याप्त होता है ? अर्थात् कभी नहीं क्योंकि वह थोड़ा होता है। और वाणिज्य (व्यवसाय) भी क्या महाधन के लिये पर्याप्त होता है ? अर्थात् नहीं।

राजसेवां विना द्रव्यं विपुलं नैव जायते ॥ २७९ ॥
राजसेवाऽतिगहना बुद्धिमद्भिर्विना न सा ।
कर्तुं शक्या चेतरेण ह्यसिधारेव सा सदा ॥ २८० ॥
बिना राजसेवा के विपुल धन-प्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश— वस्तुतः बिना राजसेवा के विपुल धन की प्राप्ति नहीं होती है किन्तु राजसेवा अत्यन्त गहन (कठिन) है और बुद्धिमान को छोड़कर अन्य मूर्खजनों के द्वारा वह नहीं की जा सकती है क्योंकि वह तलवार की धार के समान तीक्ष्ण है उसपर मूर्ख लोग सदा नहीं चल सकते हैं।

व्यालग्राही यथा व्यालं मन्त्री मन्त्रबलान्नृपम् ।
करोत्यधीनं तु नृपे भयं बुद्धिमतां महत् ॥ २८१ ॥
राजाओं के साथ सर्प की भांति सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश— सर्प पकड़नेवाला जैसे मन्त्र के बल से सांप को अपने अधीन करता है वैसे ही मन्त्री को भी अपने मन्त्र अर्थात् मन्त्रणा (उचित सलाह) के बल से राजा को अधीन करना चाहिये इसीसे राजा को बुद्धिमानों से अधिक भय रखना चाहिये अर्थात् सतर्कता से व्यवहार करना चाहिये।