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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 257 of 526

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Page 257

तृतीयोऽध्यायः १७१

रक्षितारं मृगयते भीतश्छिद्रं तु दुर्जनः।

योग्य कुलवधू स्त्री पति को, कुलटा स्त्री-जार (परस्त्रीगामी उपपति) को, रोगी वैद्य को, दूकानदार-महंगाई को, याचक-दानशील को, भयभीत पुरुष रक्षा करनेवाले को और दुर्जन छिद्र (दोष या बुराई करने के अवसर) को सदा ढूँढ़ता रहता है।

चण्डायते विवदते स्वपित्यश्नाति मादकम् ॥ २७१ ॥
करोति निष्फलं कर्म मूर्खो वा स्वेष्टनाशनम् ।

**मूर्ख जनों के कृत्य—**मूर्खजन कभी अत्यन्त क्रोधी के समान आचरण करता है, कभी झगड़ा करता है, कभी अधिक सोता है, कभी मादक (भांग-शराब आदि) द्रव्य भक्षण करता है, कभी कार्य को निष्फल और कभी अपना इष्ट कार्य या वस्तु को नष्ट कर देता है।

तमोगुणाधिकं क्षात्रं ब्राह्मं सत्त्वगुणाधिकम् ॥ २७२ ॥
अन्यद्रजोधिकं तेजस्तेषु सत्त्वाधिकं वरम् ।

**सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देश—**क्षत्रियोँ का तेज अधिक तमोगुणी, ब्राह्मणों का तेज अधिक सत्त्वगुणी, इससे अन्य वैश्यों का तेज अधिक रजोगुणी होता है। इन सबों में अधिक सत्त्वगुणी तेज ही श्रेष्ठ होता है।

सर्वाधिको ब्राह्मणस्तु जायते हि स्वकर्मणा ॥ २७३ ॥
तत्तेजसोऽनुतेजांसि सन्ति च क्षत्रियादिषु ।

**स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देश—**और इन सबों में ब्राह्मण ही अपने अध्ययन-अध्यापनादि ६ कर्मों के द्वारा सबसे अधिक श्रेष्ठ होता है। क्षत्रियादि अन्य वर्णों में जो तेज हैं वे ब्राह्मण के तेज से हीन (न्यून) हैं।

स्वधर्मस्थं ब्राह्मणं हि दृष्ट्वा बिभ्यति चेतरे ॥ २७४ ॥
क्षत्रियादिर्नान्यथा स्वधर्मं चातः समाचरेत् ।

**स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देश—**ब्राह्मण को अपने धर्म में स्थित देखकर अन्य क्षत्रियादि जाति के लोग उससे डरते हैं अन्यथा (अपने धर्म से च्युत रहने पर) नहीं डरते हैं। अतः ब्राह्मण को अपने धर्म का आचरण करना चाहिये।

न स्यात् स्वधर्महानिस्तु यथा वृत्त्या च सा वरा ॥ २७५ ॥
स देशः प्रवरो यत्र कुटुम्बपरिपोषणम् ।

**धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठता—**जिस आजीविका से अपने धर्म की हानि न हो वही आजीविका श्रेष्ठ है। जिस देश में अपने कुटुम्ब का भलीभांति पोषण हो वही देश सबसे उत्तम है।