शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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और पशु भी चारा देने एवं पुचकार कर बुलाने से वश में हो जाते हैं। फिर मनुष्यों के विषय में क्या कहना है ?।
न विद्यया न शौर्येण धनेनाभिजनेन च ॥ ८६ ॥
न बलेन प्रमत्तः स्यान्नातिमानी कदाचन ।
विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध— विद्या, शूरता, धन, कुल और बल के मद से मतवाला एवं अत्यन्त मानी कभी नहीं होना चाहिये ।
नाप्तोपदेशं संवेत्ति विद्यामत्तः स्वहेतुभिः ॥ ८७ ॥
अनर्थमप्यभिप्रेतं मन्यते परमार्थवत् ।
महाजनैर्धृतः पन्था येन संत्यज्यते बलात् ॥ ८८ ॥
विद्यामत्तता के अनर्थकारी फल— विद्या के मद से उन्मत्त पुरुष अपने तर्कों से आप्त (परमहितैषी) जनों के उपदेश-वचनों को कुछ भी नहीं समझता है और अनर्थकारी भी अपने अभीष्ट विचार को परमार्थ-युक्त (उचित कर्तव्य) समझता है। और जिससे वह अच्छे पुरुषों से स्वीकृत मार्ग का भी हठात् परित्याग कर देता है।
शौर्यमत्तस्तु सहसा युद्धं कृत्वा जहात्यसून् ।
व्यूहादियुद्धकौशल्यं तिरस्कृत्य च शात्रवान् ॥ ८९ ॥
शौर्यमत्तता के अनर्थकारी फल— और जो व्यक्ति शूरता से मत्त होता है वह सहसा (बिना विचारे) शस्त्रों को धारण किये हुये व्यूह-रचना आदि युद्धसंबन्धी कौशल का भी तिरस्कार करके युद्ध करता हुआ अपने प्राणों का परित्याग कर देता है।
श्रीमत्तः पुरुषो वेत्ति न दुष्कीर्तिमजो यथा ।
स्वमूत्रगन्धं मूत्रेण मुखमासिञ्चते स्वकम् ॥ ९० ॥
धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन— जैसे बकरा अपने मूत्र के गन्ध को नहीं जानता है बल्कि उसी मूत्र से अपने मुख को सींचता रहता है उसी भांति धन के मद से मत्त पुरुष अपने मुख को दुष्कीर्ति से नीचे करवाता है तो भी दुष्कीर्ति का नहीं ख्याल करता है।
तथाभिजनमत्तस्तु सर्वान्नैवावमन्यते ।
श्रेष्ठानपीतरान्सम्यगकार्ये कुरुते मतिम् ॥ ९१ ॥
कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन— तथा कुलीनता के मद से मत्त पुरुष श्रेष्ठ तथा नीच सभी लोगों का तिरस्कार करता रहता है। और नहीं करने योग्य बुरे कार्यों में अपनी बुद्धि अच्छी तरह से करता है अर्थात् बुरे कार्य करने का विचार रखता है और सदा करता भी है।
बलमत्तस्तु सहसा युद्धे विदधते मनः ।