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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 225 of 526

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Page 225

तृतीयोऽध्यायः १३६

के लिये प्रयत्न करना चाहिये। क्योंकि मनुष्यों के लिये मित्र का पाना उत्तम बात है।

नात्यन्तं विश्वसेत् कञ्चिद् विश्वस्तमपि सर्वदा ॥ ८० ॥
पुत्रं वा भ्रातरं भार्यामामात्यमधिकारिणम् ।
धनस्त्रीराज्यलोभो हि सर्वेषामधिको यतः ॥ ८१ ॥

विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध—सर्वदा विश्वासपात्र किसी भी व्यक्ति का यहां तक पुत्र, भाई, स्त्री, अमात्य या अधिकारी पुरुष का भी अत्यन्त विश्वास नहीं करना चाहिये। क्योंकि सभी लोगों को धन, स्त्री तथा राज्य का लोभ अधिक रूप से होता है।

प्रामाणिकं चानुभूतमाप्तं सर्वत्र विश्वसेत् ।
प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देश—अतः विश्वस्त रूप से प्रामाणिक, सुपरिचित एवं हितैषी लोगों का सर्वत्र विश्वास करना चाहिये।

विश्वसित्वात्मवद्गूढस्तत्कार्यं विमृशेत् स्वयम् ॥ ८२ ॥
तद्वाक्यं तर्कतोऽनर्थं विपरीतं न चिन्तयेत् ।
परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देश—अपने समान विश्वास करके भी छिपकर उसे (विश्वासपात्र) के कार्यों की परीक्षा करे। और परीक्षा करने के बाद वस्तुतः विश्वासपात्र निकलने पर उसके वाक्यों में तर्क से अनर्थ होने से विरुद्ध जैसा विचार न करे अर्थात् उसके वचनों को निःसन्देह सर्वतोभावेन मान ले।

चतुःषष्टितमांशं तन्नाशितं क्षमयेदथ ॥ ८३ ॥
स्वधर्मनीतिबलवांस्तेन मैत्रीं प्रधारयेत् ।
और यदि उक्त विश्वासपात्र व्यक्ति के द्वारा कार्य का ६४ वां भाग (यत्किञ्चित् भाग) नष्ट हो जाय तो भी उसे क्षमा कर दे (उसका विचार न करे) और वह अपने धर्म तथा नीति में बलवान् है अतः उसके साथ मैत्री रखे।

दानैर्मानैश्च सत्कारैः सुपूज्यान् पूजयेत् सदा ॥ ८४ ॥
दान, मान और सेवा से अत्यन्त पूज्यों की सदा पूजा करे।

कदापि नोग्रदण्डः स्यात् कटुभाषणतत्परः ।
भार्या पुत्रोऽप्युद्विजते कटुवाक्यादुग्रदण्डतः ॥ ८५ ॥
उग्र दण्ड और कटु वचन का निषेध—कभी भी उग्र दण्ड देनेवाला एवं कटु-भाषण करने में तत्पर नहीं होना चाहिये, क्योंकि स्त्री तथा पुत्र भी कटु-भाषण करने एवं उग्र दण्ड करने से उद्विग्न हो उठते हैं।

पशवोऽपि वशं यान्ति दानैश्च मृदुभाषणैः ।