शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextतृतीयोऽध्यायः १२५
क्षण भर के लिये भी स्वतन्त्रता देना या दूसरे के घर में निवास करने देना, ये सब स्त्रियों के लिये दोष हैं अतः इन से दूर रखना उचित है।
भर्त्रा पिताऽथवा राज्ञा पुत्रश्वशुरबान्धवैः ॥ २१ ॥
स्त्रीणां नैव तु देयः स्याद् गृहकृत्यैर्विना क्षणः ।
पति, पिता, राजा, पुत्र, श्वशुर, बान्धव इन सबों के लिये उचित है कि वे गृहकृत्यों के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिये थोड़ा भी समय फुर्सत का स्त्रियों को नहीं ही देवें।
चण्डं षण्ढं दण्डशीलमकामं सुप्रवासिनम् ॥ २२ ॥
सुदरिद्रं रोगिणं च ह्यन्यस्त्रीनिरतं सदा ।
पतिं दृष्ट्वा विरक्ता स्यान्नारी वाऽन्यं समाश्रयेत् ॥ २३ ॥
त्यक्त्वैतान् दुर्गुणान् यत्नात्ततो रक्ष्याः स्त्रियो नरैः ।
यत्नपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने का निर्देश— चण्ड (अत्यन्त क्रोधी), षण्ढ (नपुंसक), सदा दण्ड देनेवाले, अनुराग-रहित, अधिक प्रवास में रहनेवाले (पत्नी से अलग विदेश में रहनेवाले), अत्यन्त दरिद्र, रोगी, सदा पर-स्त्री में आसक्त रहनेवाले अपने पति को देखकर स्त्री विरक्त हो जाती है अथवा अन्य पुरुष का आश्रय पकड़ लेती है अतः इन दुर्गुणों को यत्नपूर्वक छोड़कर मनुष्यों को सदा स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिये।
वस्त्रान्नभूषणं प्रेममृदुवाग्भिश्च शक्तितः ॥ २४ ॥
स्वात्यन्तसन्निकर्षेण स्त्रियं पुत्रं च रक्षयेत् ।
वस्त्र, अन्न, आभूषण, प्रेम तथा मृदु वचनों से यथाशक्ति व्यवहार करते हुये अपने अत्यन्त समीप में रखकर स्त्री तथा पुत्र की रक्षा करे।
चैत्यपूज्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मतुषाशुचीन् ॥ २५ ॥
नाक्रामेच्छर्करालोष्टबलिस्नानभुवोऽपि च ।
चैत्यादिकों के लंघन का निषेध— चैत्य (रास्ते के देवाधिष्ठित वृक्ष विशेष), गुरुजन, पताका, अप्रशस्त वस्तुओं की छाया, भस्म, भूसी, अपवित्र-वस्तु, बालू (कंकरीली भूमि), ढेला, बलि (पूजा द्रव्य) तथा स्नानभूमि इनका उल्लङ्घन करना उचित नहीं है।
नदीं तरेन्न बाहुभ्यां नाग्निं स्कन्नमभिव्रजेत् ॥ २६ ॥
सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद् दुष्टयानवत् ।
तैर कर नदी को पार आदि करने का निषेध— बाहुओं से तैर कर नदी को नहीं पार करना चाहिये। ढकी हुई अग्नि को पैर से नहीं मसलना चाहिये पाठान्तर में अग्नि की राशि की तरफ नहीं जाना चाहिये। पार ले जाने में समर्थ है या नहीं ऐसी सन्देहयुक्त नौका पर और चढ़ने पर भार
६ शु०