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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 212 of 526

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Page 212

१२६ | शुक्रनीतिः

भक्त्या कल्याणमित्राणि संवेतेतरदूरगः ॥ ६ ॥
**निषिद्धाचरणों का निर्देश—**मल-मूत्रादि का वेग रोके हुये, किसी कार्य के करने में तत्पर न हो, और उक्त वेगों को बलपूर्वक न रोके तथा इतर (दुर्जनादि) से दूर रहकर कल्याणकारी कार्य और मित्रों का भक्तिपूर्वक सेवन करे।

हिंसास्तेयान्यथाकाम—पैशुन्यं परुषानृतम् ।
सम्भिन्नालापव्यापादमभिध्यादृग्विपर्ययम् ॥ ७ ॥
पापकर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत् ।
**दशविध पापों का निर्देश—**हिंसा (किसी की हत्या या कष्ट पहुँचाना), स्तेय (चोरी), अन्यथाकाम (अवैध रीति से मैथुन), पैशुन्य (चुगलखोरी), निष्ठुर भाषण, झूठा व्यवहार, भेदयुक्त बातों से दिल को तोड़ना, अविनाश (अशिष्टता), नास्तिकता, अवैध आचरण ये १० प्रकार के पाप कर्म हैं। इन्हें शरीर, वाणी तथा मन से छोड़ देना उचित है।

धर्मकार्यं यतन् शक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानवः ॥ ८ ॥
प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र वै नास्ति संशयः ।
यदि मनुष्य यथाशक्ति प्रयत्न करने पर भी धर्मकार्य का फल (बीच में विघ्न होने से) नहीं प्राप्त करता है तो वह इस संसार में दूसरे किसी समय में अवश्य उस पुण्यकार्य के फल को प्राप्त करता है—इसमें कोई सन्देह नहीं है।

मनसा चिन्तयन् पापं कर्मणा नाभिरोचयेत् ॥ ९ ॥
तत् प्राप्नोति फलं तस्येत्येव धर्मविदो विदुः ।
'मनसे पाप-कर्म की चिन्ता करता हुआ भी मनुष्य कभी उसे कार्य रूप में परिणत करने की इच्छा न करे। क्योंकि पापकर्म करने पर उसके फल को वह अवश्य पाता है' ऐसा धर्म के जाननेवाले पण्डितजन कहते हैं।

अवृत्तिव्याधि-शोकार्त्ताननुवर्तेत शक्तितः ॥ १० ॥
आत्मवत् सततं पश्येदपि कीटपिपीलिकम् ।
**दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश—**जीविका से रहित तथा व्याधि या शोक से आत्तंलोगों की यथाशक्ति सहायता पहुँचाकर उपकार करना चाहिये एवं कीड़े तथा चींटियों तक के भी सुख-दुःखादि को अपनी ही भाँति समझना चाहिये।

उपकारप्रधानः स्यादपकारपरेऽप्यरौ ॥ ११ ॥
संपद्विपत्स्वेकमना हेतावीर्षेत् फले न तु ।
अपने साथ अपकार करने में तत्पर शत्रु के साथ भी प्रधान रूप से