शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 211 of 526
Read in contextतृतीयोऽध्यायः
अथ साधारणं नीतिशास्त्रं सर्वेषु चोच्यते ।
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ १ ॥
सर्वों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश— अब युवराजादि के लक्षणादि का निरूपण करने के बाद राजा-प्रजा सभी लोगों के लिये नीति शास्त्र का वर्णन करते हैं। सभी प्राणियों को किसी भी कार्य करने की जितनी प्रवृत्तियां हैं वे सभी आत्मसुख के लिये होती हैं।
सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत् ।
त्रिवर्गशून्यं नारम्भं भजेत्तं चाविरोधयन् ॥ २ ॥
अनुयायात्प्रतिपदं सर्वधर्मेषु मध्यमः ।
धर्म के बिना सुख न मिलने का निर्देश— धर्म के बिना सुख नहीं होता है अतः धर्म में तत्पर होना चाहिये। धर्म, अर्थ, काम इनके वर्ग को 'त्रिवर्ग' कहते हैं। इससे शून्य किसी कार्य को न करे। उक्त त्रिवर्ग के विरोध को बचाते हुये मध्यवर्ती होकर सभी कार्यों में प्रतिपद् पर त्रिवर्ग का अनुसरण करे अर्थात् त्रिवर्ग का पालन न छोड़े।
नीचरोमनखश्मश्रुर्निर्मलांघ्रिमलायनः ॥ ३ ॥
स्नानशीलः सुसुरभिः सुवेशोऽनुल्बणोज्ज्वलः ।
धारयेत्सततं रत्नसिद्धमन्त्रमहौषधीः ॥ ४ ॥
सर्व-साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश— रोम (बाल)-दाढ़ी-मूंछ तथा नखों को नीच (छोटे २ अर्थात् बड़े हुये नहीं) एवं पैर तथा कान, नाक, आंख, मुख आदि को स्वच्छ किये हुये, स्नान किये हुये, सुगन्धित इत्र आदि लगाये हुये, अनुद्धत तथा उज्ज्वल सुन्दर वेश बनाये हुये, रत्न, सिद्ध मन्त्र एवं महौषधियों को नित्य धारण करना चाहिये।
सातपत्रपदत्राणो विचरेद्युगमात्रदृक् ।
निशि चात्ययिके कार्ये दण्डी मौली सहायवान् ॥ ५ ॥
छाता तथा जूता धारण किये हुये, युग (बैल आदि को रथ में जोतने के समय उनके कन्धों पर रखनेवाला काष्ठ) के बराबर दूरी पर दृष्टि रख कर मार्ग चलना चाहिये। रात्रि में किसी दुर्घटनाबश यदि घर से निकलना पड़े तो हाथ में दण्ड लेकर तथा सिर पर पगड़ी बांध कर एवं साथ में किसी सहायक का लेना उचित है।
न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान्न वेगानीरयेद् बलात् ।