शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 209 of 526
Read in contextद्वितीयोऽध्यायः १२३
अभावे क्षत्रिया योज्यास्तदभावे तयोरुजाः ।
नैव शूद्रास्तु संयोज्या गुणवन्तोपि पार्थिवैः ॥ ४३० ॥
१० प्रकृति पुरोहितादियों का जाति-नियम— पुरोहित आदि जो पूर्वोक्त १० प्रकृतियां ( प्रधान ) हैं उनके पद पर रहनेवाले सभी ब्राह्मण ही नियुक्त करने चाहिये । ब्राह्मण के अभाव में क्षत्रिय, क्षत्रिय के अभाव में वैश्यों की नियुक्ति करनी चाहिये । और राजा को गुणवान ( योग्य ) शूद्रों की नियुक्ति उक्तपदों पर नहीं ही करनी चाहिये ।
भागग्राही क्षत्रियस्तु साहसाधिपतिश्च सः ।
ग्रामपो ब्राह्मणो योज्यः कायस्थो लेखकस्तथा ॥ ४३१ ॥
शुल्कग्राही तु वैश्यो हि प्रतिहारश्च पादजः ।
सेनाधिपः क्षत्रियस्तु ब्राह्मणस्तदभावतः ॥ ४३२ ॥
भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये क्षत्रियादि रखने का निर्देश— और कर ( मालगुजारी ) वसूल करनेवाले तथा शासन कार्य करने-वाले लोगों के पद पर क्षत्रिय, ग्रामाध्यक्ष पद पर ब्राह्मण नियुक्त करना चाहिये । और लेखक पद पर कायस्थ,, शुल्क ( चुंगी आदि ) वसूल करने के लिये वैश्य, द्वारपाल पद पर शूद्र और सेनापति पद पर क्षत्रिय उसके अभाव में ब्राह्मण नियुक्त करना चाहिये ।
न वैश्यो न च वै शूद्रः कातरश्च कदाचन ।
सेनापतिः शूर एव योज्यः सर्वासु जातिषु ॥ ४३३ ॥
सेनापति पद पर शूरमात्र को रखने का निर्देश— और कभी वैश्य, शूद्र या कायर पुरुष सेनापति नहीं बनाना चाहिये क्योंकि सभी जातियों में जो शूर होता है वही सेनापति पद पर नियुक्त होता है ।
ससङ्करचतुर्वर्णधर्मोऽयं नैव पावनः ।
यस्य वर्णस्य यो राजा स वर्णः सुखमेधते ॥ ४३४ ॥
संकीर्ण जातियों के सहित चारो ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ) वर्णों का यह धर्म है । किन्तु यवनों का नहीं है । अर्थात् उक्तरीति से अधिकारी गणों की नियुक्ति में जाति का विचार यवनों में नहीं है और जिस जाति का राजा है उस जाति के लोग उसके राज्य में सुखी होते हैं ।
नोपकृतं मन्यते स्म न तुष्यति सुसेवनैः ।
कथान्तरे न स्मरति शङ्कते प्रलपत्यपि ॥ ३३५ ॥
क्षुब्धस्तनोति मर्माणि तं नृपं भृत्यकस्त्यजेत् ।
भृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा के लक्षण— जो किसी के उपकार को