Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 208 of 526

Read in context
Page 208

१२२ | शुक्रनीतिः

राजा का भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन—राजा योग्यतानुसार भृत्यों एवं प्रजाजनों का मनोरञ्जन निम्नरीति से करे जैसे—किसी को शाखा-प्रदान ( यत्किंचित् देने ) से, किसी को फलदान ( यत्किंचित् से कुछ अधिक देने ) से, किसी को अच्छी दृष्टि से देखने से, किसी को हँसकर बात-चीत करने से, किसी को कोमल वचनों से, किसी को सुन्दर भोजन, सुन्दर वस्त्र, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) या धन देने से, किसी को अच्छी तरह से कुशल-प्रश्न करने से, किसी को किसी विभाग का अधिकार-प्रदान करने से, किसी को वाहन ( सवारी ) या योग्य आभूषण-प्रदान करने से, किसी को छात्र ( पक्षों का बना छाता ), आतपत्र ( वस्त्र का बना छाता ), चामर या दीपक-प्रदान करने से, किसी को क्षमा-प्रदान करने से, किसी को प्रणाम करने से, किसी को संमान के साथ उसके साथ गमन करने से, किसी को सत्कार करने से, किसी को शास्त्रीय प्रसङ्ग चलाने से, किसी को आदर, शान्ति या प्रेम-प्रदर्शन करने से, किसी को समीप में रहने से, किसी को अपने अर्द्धासन पर बैठाने से, किसी को संपूर्ण आसन-प्रदान करने से और किसी को स्तुति या उपकार का वर्णन करने से प्रसन्न करे ।

यत्कार्ये विनियुक्ता ये कार्याङ्कैरङ्कयेच्च तान् ॥ ४२६ ॥
लोहजैस्ताम्रजै रीतिभवै रजतसंभवैः ।
सौवर्णै रत्नजैर्वापि यथायोग्यैः स्वलाञ्छनैः ॥ ४२७ ॥
प्रविज्ञानाय दूरात्तु वस्त्रैश्च मुकुटैरपि ।

भृत्य को कार्य-मुद्रा से अंकित करने का निर्देश—राजा जो भृत्य जिस कार्य में नियुक्त किये गये हों, उन्हें दूर से यह अमुक कार्य में नियुक्त है, इसको फौरन जानने के लिये लोहा, तामा, पीतल, चांदी, सोना या रत्न के बने हुये, योग्यतानुसार अपने-अपने चिह्नों, वस्त्रों और मुकुटों के द्वारा कार्यों ( विभागों ) के चिह्नों से युक्त करे ।

वाद्यवाहनभेदैश्च भृत्यान्कुर्यात् पृथक्पृथक् ॥ ४२८ ॥
स्वविशिष्टं च यच्चिह्नं न दद्यात् कस्यचिन्नृपः ।

भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध—और राजा विशिष्ट अधिकारियों को बाजे और सवारियों की भिन्नता से अर्थात् इस अधिकारी के यातायात के समय ऐसे बाजे होने चाहिये । और इस अधिकारी के यातायात में ऐसी सवारी होना चाहिये—इस भांति की विशेषताओं से पृथक्-पृथक् करे और राजा अपने विशिष्ट राजचिह्न छत्र-मुकुटादि को किसी के लिये न देवे ।

दश प्रोक्ताः पुरोधाद्या ब्राह्मणाः सर्व एव ते ॥ ४२६ ॥