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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 20 of 526

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Page 20

( १८ )

मानव-स्वभावगत द्वेष आदि के कारण हुए वैषम्य का ही यथावत् वर्णन शास्त्रों में किया गया है ?

उपर्युक्त चार प्रधान उपायों में भी मनु¹ के अनुसार 'साम' तथा 'दण्ड' प्रधान हैं। कुल्लूकभट्ट का कहना है कि² धन-सैन्यादि-प्रक्षय-हीन होने के कारण साम प्रशस्त है और दण्ड में धनादि-क्षय होने पर भी फलाधिक्य है अतः दण्ड भी प्रशस्त है। परन्तु कुल्लूकभट्ट के फलातिशय से यह संकेत मिलता है कि दण्ड ही प्रशस्ततर है क्योंकि प्रवृत्ति में उत्कर्ष फलोत्कर्ष-प्रयुक्त ही होना चाहिए। अत एव स्वयम् मनु ने भी अन्यत्र³ दण्ड को ही सर्वाधिक महत्त्व दिया है। इसके विपरीत मत्स्य-पुराण⁴ का कथन है कि 'दान' ही सर्वोत्कृष्ट उपाय है। परन्तु यह बहुत उचित नहीं प्रतीत होता है। मेरी दृष्टि से राजनीति से सम्बद्ध 'दान' में उत्कोच ( Bribe ) का भी समावेश है, यह यज्ञादि-गत विशुद्ध दान नहीं है। दूसरी बात यह है कि दान का क्षेत्र संकुचित है जब कि दण्ड का क्षेत्र असंकुचित। अतः दान की अपेक्षा राजनीति में दण्ड का महत्त्व अधिक है। अत एव स्वयम् मत्स्य-पुराण⁵ ने भी अन्य उपायों के असामर्थ्य में दण्ड के सामर्थ्य का उल्लेख किया है। महाभारत⁶ में भी


१. सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः ।
साम-दण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ॥ म० स्मृ० ७।१०९ ॥
२. साम्नि प्रयास-धन-व्यय-सैन्य-प्रक्षयादि-दोषाभावात् दण्डे तु तत्सद्भावेऽपि कार्य-सिद्धयतिशयात् ॥ कुल्लूकभट्ट—म० स्मृ० ७।१०९ ॥
३. स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः ।
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ म० स्मृ० ७।१७ ॥
सर्वो दण्ड-जितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वम् जगद् भोगाय कल्पते ॥ म० स्मृ० ७।२२ ॥
दण्डे वैनयिकी क्रिया—म० स्मृ० ७।६५ इत्यादि ।
४ सर्वेषामप्युपायानां दानं श्रेष्ठ-तमं मतम् ।
सुदत्तेनेह भवति दानेनोभय-लोकजित् । म० पु० २२३।१ ॥
इस प्रसङ्ग में यह सम्पूर्ण अध्याय द्रष्टव्य है।
५. न शक्या ये वशे कर्तुम् उपाय-त्रितयेन तु ।
दण्डेन तान् वशीकुर्यात् दण्डो हि वशकृन्नृणाम् ॥ वही २२४।१ ॥
म० पु० का यह २२४ अध्याय दण्ड की प्रशंसा में ही पर्यवसन्न है।
६. समस्त पञ्चदश अध्याय (शान्ति-पर्व) दण्ड-प्रशंसा में ही लिखा गया है तथा अन्यत्र भी दण्ड की अत्यधिक प्रशंसा मिलती है।