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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 19 of 526

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Page 19

( १७ )

किसी स्मृत्यन्तर के प्रामाण्य के आधार पर विज्ञानेश्वर¹ ने माता, पिता, स्नातक, पुरोहित, परिव्राजक तथा वानप्रस्थ को दण्ड के क्षेत्र से बहिर्भूत माना है। परन्तु उस स्मृत्यन्तर में ‘श्रुत-शील-शौचाचारवन्तः’ इस हेतु-गर्भ विशेषण से और मनु² आदि के कथन से यह सिद्ध होता है कि उपर्युक्त विशेषण से हीन होने पर महान् अपराधी कोई भी व्यक्ति दण्डनीय हो सकता है—चाहे वह स्नातक हो या परिव्राजक। वस्तुतः यदि उक्त विशेषण से सम्पन्न कोई अन्य व्यक्ति भी होगा तो उसे दण्ड देने का प्रश्न ही नहीं उठता है। इस प्रसंग में माता पिता आदि को साधारण अपराध का दण्ड नहीं देना चाहिए—इतना माना जा सकता है।

हाँ, इस प्रसङ्ग में इतना तो विचारणीय है ही कि शत्रु राजा के विषय में दण्ड-प्रयोग की कटुता का औचित्य कहाँ तक है। विष्णुधर्मोत्तर³ में वर्णित ‘स्व-विषय-दण्ड’ तथा ‘पर-विषय-दण्ड’ की विधि में स्पष्ट तारतम्य दीख पड़ता है। अन्यत्र⁴ भी शत्रु-विषयक-दण्ड की तीक्ष्णता बतलाई गई है। सम्भवतः


१. एतच्च माता-पित्रादि-व्यतिरेकेण। तथा च स्मृत्यन्तरम्—"अदण्ड्यौ माता-पितरौ स्नातक-पुरोहित-परिव्राजक-वानप्रस्थाः श्रुत-शील-शौचाचारवन्तः ते हि धर्माधिकारिणः" इति। मिताक्षरा १।३५८।

२. पिताऽऽचार्यः सुहृन्माता भार्या पुत्रः पुरोहितः।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति॥ म० स्मृ० ८।३३५॥
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः।
दण्डस्यैव भयादेते मनुष्याः वर्त्मनि स्थिताः॥
महाभारत (शा० प०) १५।१२॥
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः।
उत्पथ-प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम्॥ शु० नी० सा० ४।४७॥
अपि भ्राता सुतोऽप्यो वा श्वशुरो मातुलोजपि वा।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति धर्माद्विचलितः स्वकात्॥
या० स्मृ० १।३५८॥
आश्रमी यदि वा वर्णी पूज्यो वाप्य गुरुर्महान्।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति॥
मत्स्य-पुराण—२२४।५॥

३. रा० नी० प्र०, पृ० २९६—३०४॥
४. भृश-दण्डश्च शत्रुपु—म० स्मृ० ७।३२;
रिपोः प्रजानां सम्भेदः पीडनं स्व-जयाय वै॥ शु० नी० सा० ४।३६॥

२ शु० मू०