शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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उन्हें उन (बकरा आदि) सब पशुओं की वृद्धि तथा पोषण करने में कुशल एवं उनके दुख से दुखी होने वाले होना चाहिये। इसी प्रकार से हाथी तथा ऊंट आदि के भी जो अध्यक्ष हों उन्हें भी हाथी, ऊँट आदि की सेवा करने वाला होना चाहिये। और ऐसे ही लोगों की नियुक्ति भी करनी चाहिये ।
युद्धप्रवृत्तिकुशलास्तित्तिरादेश्च पोषकाः ॥ १५० ॥
शुकादेः पाठकाः सम्यक्छ्येनादेः पातबोधकाः ।
तत्तद्हृदयविज्ञानकुशलाश्च सदा हि ते ॥ १५१ ॥
**तित्तिरादिपोषकों की योजना का निर्देश—**और इसी भांति युद्ध करने की प्रवृत्ति रखने वाले तीतर आदि पक्षियों का पालन करने वाले और सुग्गे आदि पक्षियों के भली भांति पढ़ाने वाले तथा बाज आदि पक्षियों के झपट्टा मारने की कला जानने वाले एवं उपर्युक्त पक्षियों के हृद्गत भावों के पहचानने में निपुण लोगों को सदा उन सबों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।
मानाकृतिप्रभावर्णजातिसाम्याच्च मौल्यवित् ।
रत्नानां स्वर्णरजतमुद्राणामधिपश्च सः ॥ १५२ ॥
**रत्नाध्यक्ष के लक्षण—**और रत्न, सुवर्ण, चाँदी, मुद्रा (सिक्का) के जो अध्यक्ष बनाये जांय, उन्हें रत्नादिकों के मान (तौल), आकार, चमक, रंग जाति और समानता को देखकर उनके मूल्य का जानकार होना चाहिये ।
दान्तस्तु सधनो यस्तु व्यवहारविशारदः ।
धनप्राणोऽतिकृपणः कोषाध्यक्षः स एव हि ॥ १५३ ॥
**कोषाध्यक्ष के लक्षण—**और जो विनम्र स्वभाव वाले, धनी तथा व्यवहार में चतुर, धन की प्राण के समान रक्षा करने वाले तथा अत्यन्त कृपण हों उन्हें 'कोषाध्यक्ष' पद पर नियुक्त करना चाहिये ।
देशभेदैर्जातिभेदैः स्थूलसूक्ष्मबलाबलं ।
कौशेयादेर्मानमूल्यवेत्ता वस्त्रस्य वस्त्रपः ॥ १५४ ॥
**वस्त्राधिपति के लक्षण—**और जो देश तथा जाति-सम्बन्धी विभिन्नता एवं मोटा, महीन, मजबूत, कमजोर जानकर परिमाण (तौल) और उचित मूल्य का निश्चय करनेवाला हो उसी को रेशमी आदि वस्त्रों का 'अध्यक्ष' बनाना चाहिये ।
कुटीकञ्चुकनेपथ्यमण्डपादेः परिक्रियाम् ।
प्रमाणतः सौधिकेन रञ्जनानि च वेत्ति यः ॥ १५५ ॥
तथा शय्यादिसन्धानं वितानादेर्नियोजनम् ।
वस्त्रादीनां च स प्रोक्तो वितानाद्यधिपः खलुः ॥ १५६ ॥
**वितानाद्यधिपके लक्षण—**जो वस्त्रों की कुटी (तम्बू), कञ्चुक (कवच