शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextद्वितीयोऽध्यायः
यद्यप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् ।
पुरुषेणासहायेन किमु राज्यं महोदयम् ॥ १ ॥
एकाकी राजा का राज्यकार्य करने की दुष्करता का निर्देश— यद्यपि कोई कार्य छोटा से छोटा भी हो तथापि उसे सहायक के बिना अकेले कोई पुरुष सहज में नहीं कर पाता है फिर महान अभ्युदय वाला राज्यकार्य अकेले चलाना कैसे सहज हो सकता है अर्थात् असंभव है।
सर्वविद्यासु कुशलो नृपो ह्यपि सुमन्त्रवित् ।
मंत्रिभिस्तु विना मंत्रं नैकोऽर्थं चिंतयेत्क्वचित् ॥ २ ॥
बिना मन्त्रियों के सलाह लिये व्यवहार-निर्णय का निषेध— सभी विद्याओं में कुशल एवं भलीभांति मन्त्रणा (विचार) करनेवाला भी अकेला राजा मन्त्रियों के साथ बिना सलाह किये कभी किसी व्यवहार के विषय में कोई निर्णय न करे।
सभ्या धकारिप्रकृतिसभासत्सु मते स्थितः ।
सर्वदा स्यान्नृपः प्राज्ञः स्वमते न कदाचन ॥ ३ ॥
अच्छे सहायकों से युक्त राजा की श्रेष्ठता का निर्देश— समझदार राजा सदा सभ्य अधिकारी पुरुष (ऑफिसर), प्रकृति (मन्त्री आदि), तथा कौंसिल के मेम्बरों की रायपर स्थित रहे। कभी भी अपनी ही राय पर स्थिर न रहे अर्थात् अपने मनसे कोई कार्य न करे।
प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो ह्यनर्थायैव कल्पते ।
भिन्नराष्ट्रो भवेत्सद्यो भिन्नप्रकृतिरेव च ॥ ४ ॥
स्वतन्त्रता को प्राप्त हुआ (मनमानी करनेवाला) राजा (स्वामी) अनर्थ करने में समर्थ होता है, उससे राज्य तत्काल छिन्न-भिन्न हो जाता है और उसका प्रकृति (मन्त्री आदि) वर्ग अलग हो जाता है।
पुरुषे पुरुषे भिन्नं दृश्यते बुद्धिवैभवम् ।
आप्तवाक्यैरनुभवैरागमैरनुमानतः ॥ ५ ॥
प्रत्यक्षेण च सादृश्यैः सादृशैश्च छलैर्रबलैः ।
वैचित्र्यं व्यवहाराणामौन्नत्यं गुरुलाघवैः ॥ ६ ॥
नहि तत्सकलं ज्ञातुं नरेणैकेन शक्यते ।
अतः सहायान्वरयेद्राजा राज्यविवृद्धये ॥ ७ ॥
प्रत्येक पुरुष में बुद्धि का वैभव (चमत्कार) भिन्न २ दिखाई पड़ता है