Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 142 of 526

Read in context
Page 142

५६ | शुक्रनीतिः

दृष्ट्वा सुविफलं कर्म तपस्तप्त्वा दिवं व्रजेत् ।

राजा के पारलौकिक कार्य का निर्देश—पुत्र के समान पाले हुये नौकर भी समय विपरीत होने पर शत्रुता कर बैठते हैं इसमें प्रयत्न का दोष नहीं है किन्तु भाग्य की बात है । पुरुषार्थ कर्म को इस भांति से विफल हुआ देखकर तपस्या करके स्वर्गलोकगामी बने ।

उक्तं समासतो राजकृत्यं मिश्रेऽधिकं ब्रुवे ॥ ३८८ ॥
( अध्यायः प्रथमः प्रोक्तो राजकार्यनिरूपकः )
इति शुक्रनीतौ राजकृत्याधिकारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥

राज्य-सम्बन्धी कृत्यों का संक्षेप से इस प्रकार वर्णन किया । मिश्र अध्याय में इसका विस्तार से वर्णन करेंगे । ( यह राजकार्य का निरूपण करनेवाला प्रथम अध्याय कहा गया ) ।

इस प्रकार शुक्रनीति में राजकृत्याधिकार-नामक प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ।