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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 755

‘हवनविधिके ज्ञाता, बुद्धिमान् और सरल स्वभाववाले जिन ब्राह्मण देवताको तुमने अग्निहोत्र-कार्यके लिये नियुक्त किया है, वे सदा ठीक समयपर आकर क्या तुम्हें यह सूचित करते हैं कि इस समय अग्निमें आहुति दे दी गयी और अब अमुक समयमें हवन करना है?॥ १२ ॥

‘तात! क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिताके समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणोंका सम्मान करते हो?॥ १३ ॥

‘भाऽई! जो मन्त्ररहित श्रेष्ठ बाणोंके प्रयोग तथा मन्त्रसहित उत्तम अस्त्रोंके प्रयोगके ज्ञानसे सम्पन्न और अर्थशास्त्र (राजनीति) के अच्छे पण्डित हैं, उन आचार्य सुधन्वाका क्या तुम समादर करते हो?॥ १४ ॥

‘तात! क्या तुमने अपने ही समान शूरवीर, शास्त्रज्ञ, जितेन्द्रिय, कुलीन तथा बाहरी चेष्टाओंसे ही मनकी बात समझ लेनेवाले सुयोग्य व्यक्तियोंको ही मन्त्री बनाया है?॥ १५ ॥

‘रघुनन्दन! अच्छी मन्त्रणा ही राजाओंकी विजयका मूलकारण है। वह भी तभी सफल होती है, जब नीति-शास्त्रनिपुण मन्त्रिशिरोमणि अमात्य उसे सर्वथा गुप्त रखें॥ १६ ॥

‘भरत! तुम असमयमें ही निन्द्राके वशीभूत तो नहीं होते? समयपर जाग जाते हो न? रातके पिछले पहरमें अर्थसिद्धिके उपायपर विचार करते हो न?॥ १७ ॥

‘(कोऽई भी गुप्त मन्त्रणा दोसे चार कानोंतक ही गुप्त रहती है; छः कानोंमें जाते ही वह फूट जाती है, अतः मैं पूछता हूँ—) तुम किसी गूढ़ विषयपर अकेले ही तो विचार नहीं करते? अथवा बहुत लोगोंके साथ बैठकर तो मन्त्रणा नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी निश्चित की हुऽइ गुप्त मन्त्रणा फूटकर शत्रुके राज्यतक फैल जाती हो?॥ १८ ॥

‘रघुनन्दन! जिसका साधन बहुत छोटा और फल बहुत बड़ा हो, ऐसे कार्यका निश्चय करनेके बाद तुम उसे शीघ्र प्रारम्भ कर देते हो न? उसमें विलम्ब तो नहीं करते?॥ १९ ॥

‘तुम्हारे सब कार्य पूर्ण हो जानेपर अथवा पूरे होनेके समीप पहुँचनेपर ही दूसरे राजाओंको ज्ञात होते हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारे भावी कार्यक्रमको वे पहले ही जान लेते हों?॥ २० ॥

‘तात! तुम्हारे निश्चित किये हुए विचारोंको तुम्हारे या मन्त्रियोंके प्रकट न करनेपर भी दूसरे लोग तर्क और युक्तियोंके द्वारा जान तो नहीं लेते हैं? (तथा तुमको और तुम्हारे अमात्योंको दूसरोंके गुप्त विचारोंका पता लगता रहता है न?)॥ २१ ॥