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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 2228

‘भगवान् श्रीराम रावणको मारकर मिथिलेशकुमारीको वापस ले सफलमनोरथ हो अपने महाबली मित्रोंके साथ आ रहे हैं। उनके साथ महातेजस्वी लक्ष्मण और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता भी हैं। जैसे देवराज इन्द्रके साथ शची शोभा पाती हैं, उसी प्रकार श्रीरामके साथ पूर्णकामा सीताजी सुशोभित हो रही हैं’॥ ३८-३९॥

हनुमान्जीके ऐसा कहते ही कैकेयी-कुमार भरत सहसा आनन्दविभोर हो पृथ्वीपर गिर पड़े और हर्षसे मूर्च्छित हो गये॥ ४०॥

तत्पश्चात् दो घड़ीके बाद उन्हें होश हुआ और वे उठकर खड़े हो गये। उस समय रघुकुलभूषण श्रीमान् भरतने प्रियवादी हनुमान्जीको बड़े वेगसे पकड़कर दोनों भुजाओंमें भर लिया और शोक-संसर्गसे शून्य परमानन्दजनित विपुल अश्रुबिन्दुओंसे वे उन्हें नहलाने लगे। फिर इस प्रकार बोले—॥ ४१-४२॥

‘भैया! तुम कोई देवता हो या मनुष्य, जो मुझपर कृपा करके यहाँ पधारे हो? सौम्य! तुमने जो यह प्रिय संवाद सुनाया है, इसके बदले मैं तुम्हें कौन-सी प्रिय वस्तु प्रदान करूँ? (मुझे तो कोई ऐसा बहुमूल्य उपहार नहीं दिखायी देता, जो इस प्रिय संवादके तुल्य हो)॥

‘(तथापि) मैं तुम्हें इसके लिये एक लाख गौएँ, सौ उत्तम गाँव तथा उत्तम आचार-विचारवाली सोलह कुमारी कन्याएँ पत्नीरूपमें समर्पित करता हूँ। उन कन्याओंके कानोंमें सुन्दर कुण्डल जगमगाते होंगे। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान होगी। उनकी नासिका सुघड़, ऊरु मनोहर और मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर होंगे। वे कुलीन होनेके साथ ही सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित होंगी’॥ ४४-४५॥

उन प्रमुख वानर-वीर हनुमान्जीके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीके आगमनका अद्भुत समाचार सुनकर राजकुमार भरतको श्रीरामके दर्शनकी इच्छासे अत्यन्त हर्ष हुआ और उस हर्षातिरेकसे ही वे फिर इस प्रकार बोले—

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२५ ॥