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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1882, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1882

अपने शरीरपर गिराये गये उन बाण-समूहोंकी परवा न करके महाबली हनुमान्ने अकम्पनको मार डालनेका विचार किया॥ १२ ॥

फिर तो महातेजस्वी पवनकुमार हनुमान् महान् अट्टहास करके पृथ्वीको कँपाते हुए-से उस राक्षसकी ओर दौड़े॥ १३ ॥

उस समय वहाँ गर्जते और तेजसे देदीप्यमान होते हुए हनुमान्जीका रूप प्रज्वलित अग्निके समान दुर्धर्ष हो गया था॥ १४ ॥

अपने हाथमें को ◌ं ऽ इ हथियार नहीं है, यह जानकर क्रोधसे भरे हुए वानरशिरोमणि हनुमान्ने बड़े वेगसे पर्वत उखाड़ लिया॥ १५ ॥

उस महान् पर्वतको एक ही हाथसे लेकर पराक्रमी पवनकुमार बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते हुए उसे घुमाने लगे॥ १६ ॥

फिर उन्होंने राक्षसराज अकम्पनपर धावा किया, ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें देवेन्द्रने वज्र लेकर युद्धस्थलमें नमुचिपर आक्रमण किया था॥ १७ ॥

अकम्पनने उस उठे हुए पर्वतशिखरको देख अर्धचन्द्राकार विशाल बाणोंके द्वारा उसे दूरसे ही विदीर्ण कर दिया॥ १८ ॥

उस राक्षसके बाणसे विदीर्ण हो वह पर्वतशिखर आकाशमें ही बिखरकर गिर पड़ा। यह देख हनुमान्जीके क्रोधकी सीमा न रही॥ १९ ॥

फिर रोष और दर्पसे उन वानरवीरने महान् पर्वतके समान ऊँचे अश्वकर्ण नामक वृक्षके पास जाकर उसे शीघ्रतापूर्वक उखाड़ लिया॥ २० ॥

विशाल तनेवाले उस अश्वकर्णको हाथमें लेकर महातेजस्वी हनुमान्ने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे युद्धभूमिमें घुमाना आरम्भ किया॥ २१ ॥

प्रचण्ड क्रोधसे भरे हुए हनुमान्ने बड़े वेगसे दौड़कर कितने ही वृक्षोंको तोड़ डाला और पैरोंकी धमकसे वे पृथ्वीको भी विदीर्ण-सी करने लगे॥ २२ ॥

सवारोंसहित हाथियों, रथोंसहित रथियों तथा पैदल राक्षसोंको भी बुद्धिमान् हनुमान्जी मौतके घाट उतारने लगे॥ २३ ॥

क्रोधसे भरे हुए यमराजकी भाँति वृक्ष हाथमें लिये प्राणहारी हनुमान्को देख राक्षस भागने लगे॥ २४ ॥