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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 1775

‘इन्हें श्रीरघुनाथजीके लिये अपने प्राणोंकी रक्षाका भी ध्यान नहीं रहता। ये अकेले ही युद्धमें सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार कर देनेकी इच्छा रखते हैं॥ २५॥

‘श्रीरामचन्द्रजीकी बायीं ओर जो राक्षसोंसे घिरे हुए खड़े हैं, ये राजा विभीषण हैं। राजाधिराज श्रीरामने इन्हें लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया है। अब ये आपपर कुपित होकर युद्धके लिये सामने आ गये हैं॥

‘जिन्हें आप सब वानरोंके बीचमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा देखते हैं, वे समस्त वानरोंके स्वामी अमित तेजस्वी सुग्रीव हैं॥ २८॥

‘जैसे हिमालय सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वे तेज, यश, बुद्धि, बल और कुलकी दृष्टिसे समस्त वानरोंमें सर्वोपरि विराजमान हैं॥ २९॥

‘ये गहन वृक्षोंसे युक्त किष्किन्धा नामक दुर्गम गुफामें निवास करते हैं। पर्वतोंके कारण उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है। इनके साथ वहाँ प्रधान-प्रधान यूथपति भी रहते हैं॥ ३०॥

‘इनके गलेमें जो सौ कमलोंकी सुवर्णमयी माला सुशोभित है, उसमें सर्वदा लक्ष्मीदेवीका निवास है। उसे देवता और मनुष्य सभी पाना चाहते हैं॥ ३१॥

‘भगवान् श्रीरामने वालीको मारकर यह माला, तारा और वानरोंका राज्य—ये सब वस्तुएँ सुग्रीवको समर्पित कर दीं॥ ३२॥

‘मनीषी पुरुष सौ लाखकी संख्याको एक कोटि कहते हैं और सौ सहस्र कोटि (एक नील)-को एक शङ्कु कहा जाता है॥ ३३॥

‘एक लाख शङ्कुको महाशङ्कु नाम दिया गया है। एक लाख महाशङ्कुको वृन्द कहते हैं॥ ३४॥

‘एक लाख वृन्दका नाम महावृन्द है। एक लाख महावृन्दको पद्म कहते हैं॥ ३५॥

‘एक लाख पद्मको महापद्म माना गया है। एक लाख महापद्मको खर्व कहते हैं॥ ३६॥

‘एक लाख खर्वका महाखर्व होता है। एक सहस्र महाखर्वको समुद्र कहते हैं। एक लाख समुद्रको ओघ कहते हैं और एक लाख ओघकी महौघ संज्ञा है॥ ३७ १/२॥

‘इस प्रकार सहस्र कोटि, सौ शङ्कु, सहस्र महाशङ्कु, सौ वृन्द, सहस्र महावृन्द, सौ पद्म, सहस्र महापद्म, सौ खर्व, सौ समुद्र, सौ महौघ तथा समुद्र-सदृश (सौ) कोटि महौघ सैनिकोंसे, वीर विभीषणसे तथा अपने सचिवोंसे घिरे हुए वानरराज सुग्रीव आपको युद्धके लिये ललकारते