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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 1753

उछलकर गरुड़के समान उड़ते थे॥ ८४-८५ ॥

इस प्रकार पार जाती हुई उस भयंकर वानर-सेनाने अपने महान् घोषसे समुद्रकी बढ़ी हुई भीषण गर्जनाको भी दबा दिया॥ ८६ ॥

धीरे-धीरे वानरोंकी सारी सेना नलके बनाये हुए पुलसे समुद्रके उस पार पहुँच गयी। राजा सुग्रीवने फल, मूल और जलकी अधिकता देख सागरके तटपर ही सेनाका पड़ाव डाला॥ ८७ ॥

भगवान् श्रीरामका वह अद्भुत और दुष्कर कर्म देखकर सिद्ध, चारण और महर्षियोंके साथ देवतालोग उनके पास आये तथा उन्होंने अलग-अलग पवित्र एवं शुभ जलसे उनका अभिषेक किया॥ ८८ ॥

फिर बोले—‘नरदेव! तुम शत्रुओंपर विजय प्राप्त करो और समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका सदा पालन करते रहो।’ इस प्रकार भाँति-भाँतिके मङ्गलसूचक वचनोंद्वारा राजसम्मानित श्रीरामका उन्होंने अभिवादन किया॥ ८९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२ ॥