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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 1745

तदनन्तर श्रीरघुनाथजी रोषसे लंबी साँस लेते हुए अपने भयंकर वेगशाली अनुपम धनुषको पुनः खींचने लगे। यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण उछलकर उनके पास जा पहुँचे और ‘बस, बस, अब नहीं, अब नहीं’ ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका धनुष पकड़ लिया॥ ३३ ॥

(फिर वे बोले—) ‘भैया! आप वीर-शिरोमणि हैं। इस समुद्रको नष्ट किये बिना भी आपका कार्य सम्पन्न हो जायगा। आप-जैसे महापुरुष क्रोधके अधीन नहीं होते हैं। अब आप सुदीर्घकालतक उपयोगमें लाये जानेवाले किसी अच्छे उपायपर दृष्टि डालें—कोई दूसरी उत्तम युक्ति सोचें’॥ ३४ ॥

इसी समय अन्तरिक्षमें अव्यक्तरूपसे स्थित महर्षियों और देवर्षियोंने भी ‘हाय! यह तो बड़े कष्टकी बात है’ ऐसा कहते हुए ‘अब नहीं, अब नहीं’ कहकर बड़े जोरसे कोलाहल किया॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २१ ॥


* तक्षकनागका रंग लाल माना गया है। (देखिये महाभारत, आदिपर्व ४४। २-३)