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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

पीडाकरममित्राणां यत्स्यात् कर्तव्यमेव तत्॥
(महा० उद्योग० १४३ । ६७-६८)

भट्टिकाव्यका १७ । २२ श्लोक भी इसीपर आधारित है।
४. वाल्मीकिर्यस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तमः।
५. आदिकवि वाल्मीकि उस समय कुश, समिधा आदि लेने निकले थे। व्याधके द्वारा मारे गये क्रौञ्चको देखकर उन्हें बड़ा शोक हुआ और वही श्लोकरूपमें परिणत हो गया। ‘ध्वन्यालोक’ कार श्रीआनन्दवर्धनने भी इसीसे मिलते-जुलते शब्दोंमें कहा है—

‘क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः।’ (ध्वन्यालोक १ । ५)
वस्तुतः इन दोनों ही पद्योंका मूल स्वयं आदिकवि (वाल्मी० १ । २ । ४०) का ही श्लोक है, जो इस प्रकार है—
‘सोऽनुव्याहरणाद् भूयः शोकः श्लोकत्वमागतः।’
६. ‘प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो रघवनन्दन।’
७. देखिये— ‘दारुणाः सोममभ्येत्य ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः।’ (अयोध्या० ४१ । ११) पर तिलक तथा शिरोमणि-व्याख्या।
८. ‘अवष्टब्धं च मे राम नक्षत्रं दारुणग्रहैः। आवेदयान्ति दैवज्ञाः सूर्याङ्गारकराहुभिः॥’

* यहाँ ‘सर्वभूतेभ्यः’ में प्रायः सभी प्राचीन टीकाकारोंने चतुर्थी और पञ्चमी दोनों मानकर इस पदका दो बार अर्थ किया है।
१०. इसकी उत्पत्तिकी एक दूसरी रोचक कथा ‘कल्याण’ वर्ष ३४ अंक १२ के पृष्ठ १३८९ पर देखें।
११. स्कन्दपुराण आवन्त्यखण्ड १। २४ में इनका आश्रम विदिशा (आजका भेलसा मध्यभारत) तथा भविष्यपुराण, प्रतिसर्गपर्व ४। १०। ५४ में उत्पलारण्य-उत्पलावर्त (बिठूर, कानपुर) में माना है।
१२. श्रीब्रह्माजी कहते हैं—

न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति। यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले॥
तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति।
(बाल० २। ३५-३६-३७)

१३. वाल्मीकीय रामायणके पठन-श्रवण एवं अनुष्ठानसे क्या लाभ है, इसे आगेके रामायणमाहात्म्य, युद्धकाण्डके १२८ वें सर्गके १०४ से १२२ श्लोकोंतक तथा बृहद्धर्मपुराण, पूर्वखण्डके २५ से ३० अध्यायोंतक देखना चाहिये।