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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1547, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1547

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उनतालीसवाँ सर्ग

चूड़ामणि लेकर जाते हुए हनुमान्‌जीसे सीताका श्रीराम आदिको उत्साहित करनेके लिये कहना तथा समुद्र-तरणके विषयमें शङ्कित हुर्डइ सीताको वानरोंका पराक्रम बताकर हनुमान्‌जीका आश्वासन देना

मणि देनेके पश्चात् सीता हनुमान्‌जीसे बोलीं— ‘मेरे इस चिह्नको भगवान् श्रीरामचन्द्रजी भलीभाँति पहचानते हैं॥ १ ॥

‘इस मणिको देखकर वीर श्रीराम निश्चय ही तीन व्यक्तियोंका—मेरी माताका, मेरा तथा महाराज दशरथका एक साथ ही स्मरण करेंगे॥ २ ॥

‘कपिश्रेष्ठ! तुम पुनः विशेष उत्साहसे प्रेरित हो इस कार्यकी सिद्धिके लिये जो भावी कर्तव्य हो, उसे सोचो॥ ३ ॥

‘वानरशिरोमणे! इस कार्यको निभानेमें तुम्हीं प्रमाण हो—तुमपर ही सारा भार है। तुम इसके लिये कोऽइ ऐसा उपाय सोचो, जो मेरे दुःखका निवारण करनेवाला हो॥ ४ ॥

‘हनूमन्! तुम विशेष प्रयत्न करके मेरा दुःख दूर करनेमें सहायक बनो।’ तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर सीताजीकी आज्ञाके अनुसार कार्य करनेकी प्रतिज्ञा करके वे भयंकर पराक्रमी पवनकुमार विदेहनन्दिनीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर वहाँसे जानेको तैयार हुए॥ ५१/२ ॥

पवनपुत्र वानरवीर हनुमान्‌को वहाँसे लौटनेके लिये उद्यत जान मिथिलेशकुमारीका गला भर आया और वे अश्रुगद्गद वाणीमें बोलीं— ॥ ६१/२ ॥

‘हनूमन्! तुम श्रीराम और लक्ष्मण दोनोंको एक साथ ही मेरा कुशल-समाचार बताना और उनका कुशल-मङ्गल पूछना। वानरश्रेष्ठ! फिर मन्त्रियोंसहित सुग्रीव तथा अन्य सब बड़े-बूढ़े वानरोंसे धर्मयुक्त कुशल-समाचार कहना और पूछना॥ ७-८ ॥

‘महाबाहु श्रीरघुनाथजी जिस प्रकार इस दुःखके समुद्रसे मेरा उद्धार करें, वैसा ही यत्न तुम्हें करना चाहिये॥

‘हनुमन्! यशस्वी रघुनाथजी जिस प्रकार मेरे जीते-जी यहाँ आकर मुझसे मिलें—मुझे सँभालें वैसी ही बातें तुम उनसे कहो और ऐसा करके वाणीके द्वारा धर्माचरणका फल प्राप्त करो॥ १० ॥